श्रद्धांजलि: नहीं रहे रविदासिया धर्म संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संत सुखदेव जी महाराज, समाज में शोक की लहर
चंडीगढ़/नई दिल्ली: वैश्विक रविदासिया समाज के मार्गदर्शक और अखिल भारतीय रविदासिया धर्म संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संत सुखदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए हैं। समाज, धर्म और मानवता के कल्याण के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले संत जी ने चंडीगढ़ में अंतिम सांस ली।
इटली से संचालित 'खुशी टीवी' के प्रमुख डॉ. खुशीराम सुमन ने इस हृदयविदारक समाचार की जानकारी देते हुए कहा कि संत सुखदेव जी महाराज का महाप्रयाण दुनिया भर में फैले रविदासिया समुदाय के लिए एक ऐसी क्षति है जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनका जाना एक महान धर्म-प्रचारक, निस्वार्थ समाजसेवक और कुशल रणनीतिकार के युग का अंत है।
ऐतिहासिक सफर: जब मिली संगठन की कमान
रविदासिया धर्म के इतिहास में संत सुखदेव जी महाराज का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है:
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ऐतिहासिक घोषणा: 31 जनवरी 2010 को काशी स्थित गुरु रविदास जन्मस्थान पर देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं, संतों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में विश्व गद्दीनशीं परम पूज्य संत निरंजन दास महाराज ने औपचारिक रूप से 'रविदासिया धर्म' की घोषणा की थी और पावन 'अमृतवाणी' का प्रकाश किया था।
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संगठन का गठन: इसी ऐतिहासिक मोड़ पर अमृतवाणी और धर्म के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए 'अखिल भारतीय रविदासिया धर्म संगठन' का गठन किया गया।
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शीर्ष जिम्मेदारी: 'तीसरे गुरु रविदास धर्मस्थान, कात्रज (पुणे)' के संस्थापक संत सुखदेव जी महाराज की संगठन क्षमता को देखते हुए उन्हें इस नवगठित संगठन का प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
वैश्विक स्तर पर एकजुटता और वैचारिक क्रांति
श्रीमंत सुखदेव जी महाराज ने अपनी अद्वितीय दूरदर्शिता, शालीन व्यवहार, मधुर वाणी और सबको साथ लेकर चलने के संकल्प से इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।
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वैश्विक भाईचारा: उनके नेतृत्व में दुनिया भर के रविदासिया समाज में पारस्परिक प्रेम, सद्भाव और एकता का एक नया दौर शुरू हुआ। सतगुरु रविदास महाराज की शिक्षाएं और पावन वाणी घर-घर तक पहुँची।
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जनआंदोलन का रूप: उन्होंने भारत और विदेशों में अनगिनत 'अमृतवाणी प्रचार केंद्रों' की स्थापना कराई। कस्बों से लेकर सुदूर गांवों तक सतगुरु रविदास जी के स्वरूप स्थापित कर उन्होंने धर्म प्रचार को एक व्यापक जनआंदोलन में बदल दिया।
भविष्य की राह: आधुनिक और विजनरी नेतृत्व की आवश्यकता
संत सुखदेव जी महाराज ने अपने त्याग, तपस्या और अटूट समर्पण से जिस पवित्र वैचारिक कारवां को खड़ा किया था, अब उसे आगे ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी समाज पर है। आज के समय की मांग है कि संगठन की बागडोर एक ऐसे नेतृत्व के हाथों में हो जो:
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संत जी के विचारों, मूल्यों और उनकी कार्यशैली को पूरी तरह आत्मसात कर चुका हो।
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जिसने उनके मार्गदर्शन में रहकर संगठन को चलाने और जोड़ने की बारीकियों को समझा हो।
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डिजिटल युग की जरूरत: वर्तमान समय की मांग के अनुसार अब एक ऐसे युवा, उच्च शिक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम नेतृत्व की आवश्यकता है, जो सोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों के प्रयोग में निपुण हो, ताकि वह वैश्विक स्तर पर बिखरे समाज और संगठन को डिजिटल रूप से एक सूत्र में पिरो सके।
