उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी में ‘उड़ान’ कवि सम्मेलन और मुशायरे का भव्य आयोजन

Grand Organizing of the ‘Udaan’ Kavi Sammelan and Mushaira at the Uttar Pradesh Urdu Academy
 
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लखनऊ। गोमती नगर स्थित उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सभागार में रविवार की शाम साहित्य, शायरी और अदब का यादगार संगम देखने को मिला। ‘शायरों का आशियाना अदब कल्चर एंड वेलफेयर सोसाइटी’ के तत्वावधान में आयोजित भव्य कवि सम्मेलन एवं मुशायरा ‘उड़ान’ दिवंगत शायर आदिल लखनवी की स्मृति को समर्पित रहा।

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कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष सईद हाशमी और सत्यम रोशन द्वारा अतिथियों के सम्मान एवं शॉल ओढ़ाकर स्वागत के साथ हुआ। दीप प्रज्ज्वलन डॉ. तारिक सिद्दीकी ने किया, जबकि उद्घाटन फुरकान कुरैशी ने रिबन काटकर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता हाजी एजाज चांदी वाले ने की।

देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिष्ठित और युवा शायरों-कवियों ने अपनी ग़ज़लों, नज़्मों और व्यंग्य रचनाओं से देर रात तक महफिल को रोशन रखा। मुशायरे की निजामत आसिम काकोरी ने अपने खास अंदाज़ में की, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

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इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले मेधावी विद्यार्थियों को ‘सर्टिफिकेट ऑफ एप्रिसिएशन’ देकर सम्मानित भी किया गया। डॉ. तारिक सिद्दीकी ने कहा कि आज कोई भी प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रह सकता, आवश्यकता केवल सकारात्मक सोच और दृढ़ संकल्प की है।

शायरों ने अपने कलाम से बांधा समां

युवा कवित्री शगुफ्ता अंजुम लखनवी ने पढ़ा—

“अना वाले हैं गैरत का कभी सौदा नहीं करते,
पड़ोसी हो अगर भूखा तो हम खाया नहीं करते।”

और

“बड़ी शोहरत है बेटे की, है रईसों से ताल्लुक,
ज़ईफा मां का चश्मा टूटा है, देख नहीं करते।”

व्यंग्यकार सौरभ जायसवाल ने समसामयिक राजनीति पर तंज कसते हुए पढ़ा—

“भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी सब छोड़ो,
सुनो मन की बात हो रही है।”

अफजल इलाहाबादी ने अपने शेरों से गहरी संवेदना जगाई—

“अधूरेपन से मोहब्बत सी हो गई है मुझे,
मुझे ये डर है मुकम्मल कहीं ना हो जाऊं।”

गुले सबा ने पढ़ा—

“सांपों से डसे जाने का अफसोस नहीं है,
अफसोस है ये सांप भी पाले थे हमारे।”

रुक्सार बलरामपुरी ने रिश्तों की बदलती तस्वीर को यूं बयां किया—

“दोस्तदारी है कहां, कैसी वफादारी अब,
जब यहां भाई का दुश्मन ही सगा भाई है।”

मोहन मुंतज़िर साहब ने माता-पिता के सम्मान पर भावपूर्ण शेर सुनाया—

“दूर हो जाती है हाथों की थकन पल भर में,
पैर वालिद के दबाने में मजा आता है।”

डॉ. जुबैर अंसारी ने कहा—

“मुश्किलों को दरमियां अपनों के रख कर देखिए,
मुश्किलें कम हो ना हो, अपने तो कम हो जाएंगे।”

मोहतरमा प्रतिभा यादव ने वक्त की सच्चाई पर कहा—

“वक्त आता है जब बुरे से बुरा,
साथ साया भी छोड़ जाता है।”

उस्मान मीनाई के राजनीतिक और सामाजिक तंज ने खूब तालियां बटोरीं—

“नाम के साथ ये मिश्रा भी दुकानों पे लिखो,
रिज़्क अल्लाह अता करता है सरकार नहीं।”

और

“तलवे किसी वज़ीर के गंदे नहीं रहे,
चैनल ने चाट-चाट के सब साफ कर दिए।”

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इसके अलावा फारूक आदिल, फराज अहमद, अनुज कपूर, आसिफ मुंफरिद सहित कई रचनाकारों ने अपने कलाम से श्रोताओं की भरपूर दाद हासिल की।कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी कवियों, शायरों, साहित्यप्रेमियों और अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. फैसल खान, उबैदुल्लाह नासिर, तौकीर सिद्दीकी, सरफराज जाहिद, कारी समसुज्जुहा पिहानवी, नुसरत अतीक, सहना अब्बास, नसीम गाजी, मोहम्मद इमरान, डॉ. रियाज अंसारी, डॉ. फहीम सिद्दीकी और नदीमुद्दीन सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में मोकुला विंग्स, लक्ष्य, शावेज ज़री, अम्मार वहीद, हम्माम वहीद, शहला हक, फरह नाज, नेहा परवीन, असरार अहमद, अली नईम राजी, कमरुज्जमा नदवी, सुहैल खान और हाफिज आमिर अहमद का विशेष योगदान रहा।

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