यूजीसी की गाइडलाइन या एकतरफा आदेश?

UGC guidelines or a unilateral order?
 
पूर्व में भी कुछ ऐसे आदेश और बयान सामने आ चुके हैं, जिनमें बिना ठोस जांच के कड़ी कार्रवाई की बात कही गई थी। सवाल यह है कि किसी घटना में शामिल व्यक्तियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का निर्धारण तुरंत और निश्चित रूप से कैसे किया जा सकता है? क्या प्रशासन के पास ऐसी कोई पुख्ता प्रणाली है जो प्रारंभिक स्तर पर ही निष्पक्ष सत्यापन कर सके?  आलोचकों का कहना है कि यदि नियमों में संतुलन और जवाबदेही नहीं होगी, तो यह शिक्षा व्यवस्था में भय और असमानता को बढ़ावा दे सकता है। हाल ही में शैक्षणिक प्रवेश और मूल्यांकन से जुड़ी कुछ विवादित खबरों ने भी इन आशंकाओं को बल दिया है।  इस पूरे परिदृश्य में समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका पर भी प्रश्न उठते हैं। क्या व्यापक स्तर पर रचनात्मक संवाद और लोकतांत्रिक विरोध की कमी है? क्या सत्ता और व्यवस्था से निकटता के कारण कई लोग खुलकर अपनी चिंताएं व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं? यदि ऐसा है, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ना तय है।  लोकतंत्र में नीतियों की समीक्षा, आलोचना और सुधार आवश्यक होते हैं। किसी भी दिशा में लिया गया निर्णय यदि समाज के एक बड़े हिस्से में असुरक्षा या अन्याय की भावना पैदा करता है, तो उस पर पुनर्विचार जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य समान अवसर, बौद्धिक स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि संदेह और टकराव को।  अतीत के राजनीतिक वक्तव्यों और सामाजिक अनुभवों को संदर्भ में रखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या आज की नीतियां सामाजिक संतुलन को मजबूत कर रही हैं या नई दरारें पैदा कर रही हैं। यही समय है जब सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर खुली चर्चा करें, ताकि सुधार की राह निकाली जा सके और शिक्षा व्यवस्था न्यायपूर्ण बनी रहे।  — यू.एस. राना ठाकुर, दिल्ली

राना ठाकुर (ओपिनियन) हाल में यूजीसी की नई गाइडलाइनों को लेकर शिक्षा जगत में गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि किसी छात्र के कथित व्यवहार या दृष्टिकोण को किस आधार पर “हीनभावना से प्रेरित” मान लिया जाएगा। क्या यह तय करने की कोई स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और न्यायसंगत प्रक्रिया मौजूद है?

यदि किसी छात्र द्वारा शिकायत दर्ज कराई जाती है और उसे स्वतः सत्य मान लिया जाता है, जबकि बाद में शिकायत झूठी पाए जाने पर भी कोई दायित्व या कार्रवाई नहीं होती, तो यह व्यवस्था न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होती है। ऐसे प्रावधान आशंका पैदा करते हैं कि कहीं इसका दुरुपयोग न होने लगे।

पूर्व में भी कुछ ऐसे आदेश और बयान सामने आ चुके हैं, जिनमें बिना ठोस जांच के कड़ी कार्रवाई की बात कही गई थी। सवाल यह है कि किसी घटना में शामिल व्यक्तियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का निर्धारण तुरंत और निश्चित रूप से कैसे किया जा सकता है? क्या प्रशासन के पास ऐसी कोई पुख्ता प्रणाली है जो प्रारंभिक स्तर पर ही निष्पक्ष सत्यापन कर सके?

आलोचकों का कहना है कि यदि नियमों में संतुलन और जवाबदेही नहीं होगी, तो यह शिक्षा व्यवस्था में भय और असमानता को बढ़ावा दे सकता है। हाल ही में शैक्षणिक प्रवेश और मूल्यांकन से जुड़ी कुछ विवादित खबरों ने भी इन आशंकाओं को बल दिया है।

इस पूरे परिदृश्य में समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका पर भी प्रश्न उठते हैं। क्या व्यापक स्तर पर रचनात्मक संवाद और लोकतांत्रिक विरोध की कमी है? क्या सत्ता और व्यवस्था से निकटता के कारण कई लोग खुलकर अपनी चिंताएं व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं? यदि ऐसा है, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ना तय है।

लोकतंत्र में नीतियों की समीक्षा, आलोचना और सुधार आवश्यक होते हैं। किसी भी दिशा में लिया गया निर्णय यदि समाज के एक बड़े हिस्से में असुरक्षा या अन्याय की भावना पैदा करता है, तो उस पर पुनर्विचार जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य समान अवसर, बौद्धिक स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि संदेह और टकराव को।

अतीत के राजनीतिक वक्तव्यों और सामाजिक अनुभवों को संदर्भ में रखते हुए यह सवाल उठता है कि क्या आज की नीतियां सामाजिक संतुलन को मजबूत कर रही हैं या नई दरारें पैदा कर रही हैं। यही समय है जब सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर खुली चर्चा करें, ताकि सुधार की राह निकाली जा सके और शिक्षा व्यवस्था न्यायपूर्ण बनी रहे।

— यू.एस. राना ठाकुर, दिल्ली

Tags