उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को स्वर देतीं उप्रेती बहनें

The Upreti Sisters: Giving Voice to the Cultural Soul of Uttarakhand
 
उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा को स्वर देतीं उप्रेती बहनें

देवभूमि उत्तराखंड की लोक-सांस्कृतिक विरासत को अपनी मधुर आवाज़ और आध्यात्मिक गायन से वैश्विक पहचान दिलाने वाली ‘उप्रेती सिस्टर्स’— ज्योति उप्रेती और नीरजा उप्रेती — आज लोकसंगीत जगत में एक विशिष्ट स्थान बना चुकी हैं। कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी लोकधुनों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जीवंत करने वाली ये बहनें देश-विदेश के सांस्कृतिक मंचों पर अपनी अलग पहचान रखती हैं।

हाल ही में उनके द्वारा स्वरबद्ध गीत “पहाड़ी छां हम पहाड़ी रुनेर” ने श्रोताओं के दिलों को गहराई से छुआ है। इस गीत में हिमालयी जीवन, पहाड़ की सादगी, संघर्ष और प्रकृति प्रेम की सशक्त झलक देखने को मिलती है। लोकधुनों में रची-बसी यह प्रस्तुति प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती है।

उप्रेती बहनों की खासियत सिर्फ लोकगीतों तक सीमित नहीं है। वे आध्यात्मिक संगीत में भी समान रूप से पारंगत हैं। “निर्वाण षट्कम”, “गंगा स्तोत्रम्” और “न मंत्रं नो यंत्रं” जैसे वैदिक श्लोकों को उन्होंने जिस शुद्धता और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है, वह श्रोताओं को आध्यात्मिक अनुभूति से भर देता है।

इन दोनों बहनों ने “बेडू पाको बारमासा”, “मासी कू फूल”, “यो बाटो का जाणों होलू” जैसे पारंपरिक गीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। वहीं हिंदी फिल्मी गीतों को भी वे अपने अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत कर श्रोताओं का दिल जीत लेती हैं।

ज्योति उप्रेती आकाशवाणी और दूरदर्शन की ‘ए’ श्रेणी की कलाकार हैं, जबकि नीरजा उप्रेती पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट होने के बावजूद संगीत साधना को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रही हैं। वर्ष 2023 में G20 Summit 2023 के दौरान नई दिल्ली में उनकी प्रस्तुति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया और उन्हें “उत्तराखंड की स्वरागिनी” की उपाधि से सम्मानित किया गया।

पिथौरागढ़ जनपद के हुड़ेती गांव से निकली इन बहनों की गायकी में पहाड़ की मिट्टी की सोंधी खुशबू और हिमालय की आत्मा महसूस होती है। अपनी लोकधरोहर के संरक्षण और आध्यात्मिक संगीत के माध्यम से वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।

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