उर्दू शायरी भी श्रीकृष्ण के प्रेम में सराबोर
(शिव शंकर सिंह ‘पारिजात’-विभूति फीचर्स)
भारतीय संस्कृति की सबसे खूबसूरत विशेषताओं में एक यह रही है कि यहां आस्था की सीमाएं कभी इतनी कठोर नहीं रहीं कि प्रेम उनके भीतर कैद हो जाए। श्रीकृष्ण इसी सांस्कृतिक उदारता के उजले प्रतीक हैं। हिंदी और ब्रजभाषा की सगुण भक्ति धारा में कृष्ण बहुआयामी और आकर्षक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुए, लेकिन उनका प्रभाव केवल हिंदी साहित्य तक सीमित नहीं रहा। उर्दू शायरी भी कृष्ण के प्रेम, सौंदर्य और दर्शन से उसी तरह सराबोर हुई, जैसे यमुना उनकी बांसुरी की धुन से।
उर्दू साहित्य में श्रीकृष्ण केवल धार्मिक आस्था के पात्र बनकर नहीं आते, बल्कि प्रेम, सौंदर्य, करुणा, लोकमंगल और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक के रूप में दिखाई देते हैं। उनकी बांसुरी प्रेम का निमंत्रण है, रासलीला आत्मा और परमात्मा के मिलन का रूपक और कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया गीता का संदेश कर्म, धर्म और जीवन-दर्शन की सार्वभौमिक व्याख्या।
यही वजह है कि उर्दू के अनेक नामचीन शायरों ने कृष्ण को अपनी कविता, नज्म और गजल की संवेदना का हिस्सा बनाया। इस परंपरा की जड़ें मध्यकाल तक जाती हैं और आधुनिक दौर में भी इसकी धारा निरंतर दिखाई देती है।
अमीर खुसरो से शुरू हुई सांस्कृतिक संवाद की धारा
इस परंपरा में अमीर खुसरो का नाम विशेष रूप से स्मरणीय है। तेरहवीं-चौदहवीं सदी के महान सूफी कवि खुसरो भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने जाते हैं। उनकी रचनाओं में हिंदवी, फारसी और अरबी शब्दों का सहज मेल दिखाई देता है, जिसमें भारतीय लोकजीवन की आत्मा महसूस होती है।
अमीर खुसरो और कृष्ण-प्रेम से जुड़ा एक रोचक प्रसंग भी लोक परंपरा में मिलता है। कहा जाता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया को स्वप्न में कृष्ण के दर्शन हुए और उन्होंने अपने प्रिय शिष्य अमीर खुसरो को कन्हैया के विषय में कुछ रचने की प्रेरणा दी। हालांकि इस प्रसंग की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यह कथा भारतीय सांस्कृतिक मानस में सूफी परंपरा और कृष्ण भक्ति के बीच मौजूद संवाद की गहराई जरूर दर्शाती है।
जायसी की ‘कन्हावत’ और कृष्ण
पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में मलिक मुहम्मद जायसी का नाम इस परंपरा में महत्वपूर्ण हो जाता है। उनकी रचना ‘कन्हावत’ कृष्ण-काव्य की उल्लेखनीय कृतियों में गिनी जाती है। एक मुस्लिम कवि द्वारा कृष्ण के जीवन और व्यक्तित्व को अपनी काव्य दृष्टि से देखना भारतीय साहित्य की उस उदार परंपरा का उदाहरण है, जिसमें रचनाकार धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर किसी दूसरे विश्वास के आराध्य को भी अपनी संवेदना का विषय बना सकता था।
रसखान ने कृष्ण में देखा अपना आराध्य
कृष्ण-भक्ति और मुस्लिम कवियों की चर्चा रसखान के बिना अधूरी है। मुस्लिम पृष्ठभूमि से आए रसखान कृष्ण के ऐसे अनन्य भक्त बने कि हिंदी साहित्य में उनका नाम कृष्ण भक्ति के महान कवियों में लिया जाता है।
उनके काव्य में ब्रजभूमि, गोकुल, यमुना, गोप-गोपियां और कृष्ण का बालरूप अत्यंत आत्मीयता से उपस्थित होते हैं। उनकी भक्ति में औपचारिकता की अपेक्षा आत्मसमर्पण अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि रसखान की कृष्ण भक्ति धार्मिक पहचान की सीमाओं से ऊपर उठकर प्रेम और समर्पण की मिसाल बन गई।
रहीम के काव्य में कृष्ण-प्रेम
नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध अब्दुर्रहीम खानखाना ‘रहीम’ के भीतर भी भक्ति की गहरी धारा थी। कृष्ण के प्रति उनके अनुराग को इन पंक्तियों में महसूस किया जा सकता है—
“जिहि रहीम मन आपुनो, कीन्हों चतुर चकोर,
निसि बासर लाग्यो रहे, कृष्ण चन्द्र की ओर।”
यहां कृष्ण चंद्रमा हैं और भक्त का मन चकोर। भारतीय काव्य परंपरा के इस प्रिय बिंब को रहीम ने प्रेम और समर्पण की ऐसी भाषा दी, जो धार्मिक सीमाओं से परे जाती है।
उर्दू शायरी में कृष्ण की निरंतर मौजूदगी
कृष्ण के प्रति यह आकर्षण आगे भी जारी रहा। शाह बदरुद्दीन जानम ने ‘सुख सहेला’ नाम से कृष्ण पर दोहे लिखे। बाद के दौर में शाह तैयब चिश्ती, वली दक्कनी और उजलत जैसे कवियों की रचनाओं में भी कृष्ण के उल्लेख मिलते हैं। रीतिकालीन कवि आलम शेख ने भी कन्हैया के प्रेम में ऐसी रचनाएं कीं, जिनमें कृष्ण की छवि और प्रेम की अनुभूति एक-दूसरे में घुली हुई दिखाई देती है।
अवध के नवाब वाजिद अली शाह का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। वे कला और संगीत के गहरे अनुरागी थे और उन्होंने रासलीला पर आधारित नाटकों के माध्यम से कृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा और आकर्षण व्यक्त किया। यह अवध की उस गंगा-जमुनी सांस्कृतिक परंपरा की तस्वीर पेश करता है, जहां संगीत, नृत्य, लोक और धार्मिक संवेदनाएं एक-दूसरे से संवाद करती थीं।
नजीर अकबराबादी के कृष्ण लोकजीवन के अपने पात्र
उर्दू के प्रसिद्ध शायर नजीर अकबराबादी ने कृष्ण को लोक की सहज भाषा में देखा। उनकी रचनाओं में कृष्ण का जन्म, बालपन, मथुरा के कारागार से गोकुल पहुंचने की कथा और रासलीला जैसे प्रसंग सामने आते हैं। ‘कन्हैया जी की शादी’ और ‘कन्हैया जी का रास’ जैसी रचनाओं में भी उन्होंने कृष्ण को अपनी काव्य संवेदना का विषय बनाया।
नजीर की खासियत यह थी कि वे जीवन के सामान्य उत्सवों और लोकाचार को कविता का विषय बनाते थे। उनके यहां कृष्ण किसी दूरस्थ देवता की तरह नहीं, बल्कि लोकजीवन के अपने प्रिय पात्र की तरह दिखाई देते हैं।
रास, बांसुरी और सांवली छवि से प्रभावित शायर
सीमाब अकबराबादी ने कृष्ण की मनोहारी रासलीला से प्रेरित होकर ‘प्रीत के गीत’ लिखे। मुनव्वर लखनवी ने ‘किशन का मुकाम’, ‘खुदा-ए-हुस्न किशन’ और ‘रुकमनी और किशन की अजमत’ जैसी रचनाओं में कृष्ण के अलग-अलग रूपों को सामने रखा।
मोहसिन काकोरवी की रचनाओं में मथुरा, गोकुल, कन्हैया और गोपियों का संसार दिखाई देता है। कैफी देहलवी ने भी कृष्ण को केंद्र में रखकर ‘बंशी की धुन सुनाए जा’, ‘बंशीवाले आ जा’, ‘किशन जी का फलसफा-ए-अमल’, ‘भारत की खबर लीजिए’ और ‘राधेश्याम’ जैसी रचनाएं कीं।
जोश मलसियानी ने ‘भगवान तुम्हें क्या’ में कृष्ण से संवाद किया, जबकि जोश मलीहाबादी ने ‘मुरली’ में कृष्ण की बांसुरी के माध्यम से गोकुल के वातावरण को जीवंत किया—
“यह किन ने बजाई मुरलिया।”
कृष्ण की सांवली छवि ने भी अनेक शायरों को आकर्षित किया। शाद मुहम्मद काजिम ने लिखा—
“आस चुभ गई मोरे हिए छवि सांवरी,
ऐ जसोदा लाल की।”
यहां कृष्ण का सांवला रूप महज सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि ऐसी प्रेमानुभूति का प्रतीक है जिसमें भक्त स्वयं को भूल जाता है।
आधुनिक दौर में भी कायम रही कृष्ण की छवि
आधुनिक समय में भी कृष्ण को लेकर उर्दू साहित्य की यह परंपरा समाप्त नहीं हुई। निदा फाजली की पंक्ति—
“बृंदावन के कृष्ण कन्हैया, अल्लाह हू”
भारतीय सांस्कृतिक चेतना की उस साझी विरासत की ओर संकेत करती है, जहां अलग-अलग आस्थाओं के बीच संवाद और प्रेम की संभावना बनी रहती है।
पाकिस्तान के राष्ट्रगीत ‘कौमी तराना’ के रचनाकार हफीज जालंधरी भी कृष्ण को अपनी काव्य संवेदना में स्थान देने वाले कवियों में शामिल रहे। उनकी नज्म ‘कृष्ण कन्हैया’ में रासलीला का मनोहारी चित्रण मिलता है। कृष्ण के प्रेम को वे एक ऐसे आध्यात्मिक अनुभव के रूप में देखते हैं, जिसका नशा सांसारिक मदिरा से अलग है।
बांसुरी वाले कृष्ण से आगे—पार्थसारथी और मार्गदर्शक कृष्ण
उर्दू शायरी में कृष्ण केवल बांसुरी बजाने वाले प्रेमी और रास रचाने वाले नायक नहीं हैं। वे महाभारत के पार्थसारथी, योद्धा, मार्गदर्शक और उपदेशक भी हैं। कृष्ण का यही गंभीर और दार्शनिक रूप अनेक उर्दू कवियों को आकर्षित करता रहा।
ख्वाजा दिल मोहम्मद की ‘दिल की गीता’ में कृष्ण के गीता-उपदेश को काव्यात्मक रूप दिया गया। आधुनिक दौर में कैफी आजमी ने ‘और फिर कृष्ण ने अर्जुन से कहा’ जैसी रचना के माध्यम से गीता के संदेश को समकालीन संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया।
द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में कृष्ण के उद्धारक रूप को याद करते हुए चकबस्त ने अपने समय की विडंबनाओं पर चिंता व्यक्त की—
“अब न अर्जुन है न वह ज्ञान का दरिया बाकी।”
यह पंक्ति केवल कृष्ण की अनुपस्थिति का शोक नहीं, बल्कि अन्याय के सामने खड़े होने वाले नैतिक साहस की कमी की ओर भी संकेत करती है। कृष्ण का संदेश कर्म, कर्तव्य, विवेक और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश है। इसलिए अलग-अलग धर्मों और परंपराओं से जुड़े कवियों ने कृष्ण में अपने समय के प्रश्नों के उत्तर तलाशे।
हसरत मोहानी और ‘हजरत कृष्ण जी महाराज’
मौलाना हसरत मोहानी इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण हैं। धार्मिक आस्था में गहरे रचे-बसे इस शायर ने कृष्ण के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया और उन्हें ‘हजरत कृष्ण जी महाराज’ कहकर संबोधित किया। यह संबोधन उस सांस्कृतिक भारत की तस्वीर सामने रखता है, जहां आस्था के बीच दीवारें खड़ी करने की बजाय प्रेम और सम्मान के पुल बनाए जाते थे।
इसी भावना को मौलाना जफर अली खां की इन पंक्तियों में भी देखा जा सकता है—
“अगर किशन की तालीम आम हो जाए,
तो काम फितनागरों के तमाम हो जाएं।”
इन पंक्तियों में कृष्ण की शिक्षा को शांति, विवेक और सामाजिक सद्भाव से जोड़ने का भाव दिखाई देता है।
प्रेम की भाषा किसी सीमा में कैद नहीं
कृष्ण को मुस्लिम शायरों ने किसी धार्मिक बहस में अपना पक्ष सिद्ध करने के लिए नहीं अपनाया। उन्होंने कृष्ण में प्रेम, सौंदर्य, त्याग, करुणा, ज्ञान और मनुष्यता के ऐसे प्रतीक को देखा, जो सभी के लिए अर्थवान हो सकता है।
वृंदावन का कृष्ण प्रेम और उल्लास का संदेश देता है, तो कुरुक्षेत्र का कृष्ण कर्म, विवेक और कर्तव्य का। इन दोनों रूपों का समन्वय ही कृष्ण को भारतीय चेतना का विराट प्रतीक बनाता है।
आज जब समाज में विभाजन की आवाजें सुनाई देती हैं और सांस्कृतिक पहचान को अलग-अलग खांचों में बांटने की कोशिश होती है, तब उर्दू शायरी में कृष्ण की मौजूदगी भारत की उस साझा सांस्कृतिक स्मृति की याद दिलाती है, जिसमें प्रेम को सबसे बड़ी शक्ति माना गया।
रसखान से रहीम, नजीर से हसरत मोहानी और कैफी से निदा फाजली तक कृष्ण की छवि यही संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति की शक्ति केवल विविधता में नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच प्रेम और संवाद पैदा करने की क्षमता में भी है।
कृष्ण की बांसुरी की तान इसलिए आज भी सुनाई देती है क्योंकि वह किसी एक कान के लिए नहीं बजती। वह हर उस मनुष्य के लिए है जो प्रेम की भाषा समझता है। उर्दू शायरी ने इसी प्रेम को अपनी जुबान दी है।
इस दृष्टि से जन्माष्टमी केवल कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक विरासत को याद करने का अवसर भी है, जिसमें एक मुस्लिम शायर कृष्ण के चरणों में अपना मन अर्पित कर सकता है और एक हिंदू पाठक उसकी कविता में अपने आराध्य की छवि देख सकता है।
शायद यही भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती है—जब कृष्ण की बांसुरी की तान उर्दू के शब्दों में उतरती है तो वह केवल कविता नहीं रहती, बल्कि हिंदुस्तान की साझा आत्मा की आवाज बन जाती है।
