वंदे मातरम् : सम्मान, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का अमर उद्घोष
Vande Mataram: An immortal proclamation of respect, dignity and national consciousness
Wed, 11 Feb 2026
डॉ. पंकज भारद्वाज (विनायक फीचर्स) वंदे मातरम् को लेकर जारी की गई नवीनतम गाइडलाइन ने राष्ट्रगीत के सम्मान से जुड़े एक महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट किया है। अब तक देश में राष्ट्रगान के समय खड़े होना अनिवार्य माना जाता रहा है, किंतु नई व्यवस्था के अंतर्गत वंदे मातरम् के गायन अथवा सामूहिक प्रस्तुति के समय भी खड़े होना आवश्यक माना जाएगा। यह निर्णय वंदे मातरम् को केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रसम्मान से जुड़ा आचरण मानने की दिशा में एक अहम कदम है।
इस पहल का उद्देश्य किसी पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, मर्यादा और गरिमा को सुदृढ़ करना है। वंदे मातरम् का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा में गहराई से रचा-बसा है। इसकी रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और इसे अपने कालजयी उपन्यास आनंदमठ में स्थान दिया।
“सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्” जैसे शब्द भारतभूमि को एक सजीव, करुणामयी और दिव्य मातृरूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यही कारण है कि यह गीत जन-जन में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आत्मगौरव की भावना जागृत करता है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान का उद्घोष बन गया था। सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में यह नारा नहीं, बल्कि आज़ादी की शपथ था। अंग्रेज़ी हुकूमत ने इसकी शक्ति को पहचानते हुए कई बार इसके प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, किंतु यह गीत जितना दबाया गया, उतना ही जनमानस में गहराई से उतरता चला गया।
स्वतंत्रता के बाद भी वंदे मातरम् का महत्व कम नहीं हुआ। आज़ाद भारत में जब यह गीत पहली बार ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) से गूंजा, तब करोड़ों नागरिकों ने इसे स्वाधीनता के नवप्रभात का प्रतीक मानकर सुना। वह क्षण संघर्ष से स्वराज तक की यात्रा का सजीव साक्ष्य था। संविधान निर्माताओं ने भी वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगीत का सम्मान प्रदान किया। यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक संतुलन का प्रतीक है।
नई गाइडलाइन इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट करती है कि जैसे राष्ट्रगान के समय खड़े होना सम्मान का प्रतीक है, वैसे ही वंदे मातरम् के समय खड़े होकर उसका अभिवादन करना राष्ट्र के प्रति आदर का भाव दर्शाता है। यह गाइडलाइन यह संदेश भी देती है कि राष्ट्रप्रेम केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह हमारे आचरण में भी प्रकट होना चाहिए।
वंदे मातरम् के प्रति सम्मान किसी मत, वर्ग या विचारधारा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। आज के समय में, जब सामाजिक और वैचारिक विभाजन की आशंकाएँ बढ़ रही हैं, वंदे मातरम् हमें हमारी साझा विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है। यह गीत बताता है कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और अनगिनत बलिदानों की पुण्यभूमि है।
आज वंदे मातरम् केवल गाया जाने वाला गीत नहीं, बल्कि खड़े होकर निभाया जाने वाला राष्ट्रीय दायित्व है। यही इसकी सच्ची गरिमा, प्रासंगिकता और सार्थकता है।
