वेनेजुएला की भौजी और भूरा भाई की खुन्नस
(मुकेश कबीर – विनायक फीचर्स) जब से अमेरिका के राष्ट्रपति ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पत्नी सहित उठवाकर अमेरिका की जेल में डाला है, तब से दुनिया भर के नेताओं में हड़कंप मचा हुआ है। सबको अपनी और अपनी पत्नी की चिंता सता रही होगी, लेकिन भारत के नेता निश्चिंत हैं। हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता—हमारे यहाँ तो कुंवारों की सरकारें हैं। हमारे प्रधानमंत्री आज भी दहाड़ रहे हैं, हमारे यहाँ विपक्ष के नेता भी कुंवारे मिल जाते हैं और कई मुख्यमंत्री भी। फिर भूरा भाई से कौन डरेगा?
वैसे भी वेनेजुएला का मामला थोड़ा अलग है। वह देश सबसे ज़्यादा मिस वर्ल्ड देने के लिए जाना जाता है। वहाँ की महिलाएँ दुनिया में सबसे सुंदर मानी जाती हैं—यह बात भूरा भाई भी जानते हैं। लेकिन राष्ट्रपति की पत्नी भी सबसे खूबसूरत हो, यह ज़रूरी तो नहीं। मगर अपने भूरा भाई को कौन समझाए? और वे समझते भी कब हैं! कोई समझाने की ठान ले तो भी फ़ायदा नहीं—वे अपनी खुन्नस किसी और पर निकाल लेते हैं।

पिछले साल यूक्रेन वाले ने भूरा भाई को बड़े अच्छे से समझाया था। उसके बाद भूरा भाई काफ़ी फ्रस्ट्रेशन में आ गए थे। शायद उसी का बदला उन्होंने वेनेजुएला से ले लिया, ताकि फिर कोई उन्हें समझाने की न सोचे।यही बात जब हमने अपने बेधड़क भोपाली को समझाई, तो बेधड़क ने बड़ा वाजिब सवाल किया— “मियाँ, जब यूक्रेन वाले ने हड़काया था, तो उठाया वेनेजुएला वाले को क्यों? यूक्रेन वाले को ही उठाना था न?”
तब हमने भी बेधड़क से दो वाजिब सवाल पूछे।
“चचा, कभी पागलखाने गए हो?”
“हाँ।”
“तो वहाँ किसी पागल को किसी दूसरे पागल से डरते देखा है?”
“नहीं, हमने तो सिर्फ नॉर्मल आदमी को ही पागल से डरते देखा है।”
बस, चचा—मामला यहाँ भी लगभग ऐसा ही है। जब सामने वाला अपनी टक्कर का हो, तो किसी को भी चक्कर आ जाता है। इसलिए भूरा भाई अब यूक्रेन वाले से उतनी ही दूरी रखते हैं, जितनी नई पेंट वाली दीवार रखने वाला बाबूसाब केले के छिलके से।
भूरा भाई जानते हैं कि अभी पुराना दाग मिटा नहीं है—नया दाग लगवाने से क्या फ़ायदा? वैसे भी यूक्रेन वाले की हालत अब उस नंगे जैसी हो गई है, जिससे खुदा भी डरता है। उसके पास खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं। जब वह भूरा भाई के दादा भाई से नहीं डरा, तो भूरा भाई से क्या डरेगा? और मान लो यूक्रेन वाले को उठवाकर अमेरिका ले भी आए, तो ख़तरा और बढ़ जाएगा—कहीं उसे ढूँढते-ढूँढते दादा भाई भी अमेरिका तक आ गए, तो क्या होगा पापे?
इसलिए वेनेजुएला ही ठीक लगा। कम से कम कोई डील तो हो सकती है—तुम हमें तेल दो, हम तुम्हें बेल दिला देंगे। मगर सवाल फिर भी वही है—अगर तेल ही चाहिए था, तो तेल निकाल लेते। राष्ट्रपति को उठवाने की क्या ज़रूरत थी? वो भी भौजी के साथ?
इसका जवाब सिर्फ़ भूरा भाई ही दे सकते हैं। दुनिया में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिन्हें खुद भी नहीं पता होता कि उनका अगला कदम क्या होगा। इस मामले में पहले नंबर पर हैं भूरा भाई और दूसरे नंबर पर हमारे विपक्ष के नेता। हमारे विपक्ष के नेता भी कब क्या कर दें, कोई नहीं जानता—कभी आँख मार दें, कभी प्रधानमंत्री के गले पड़ जाएँ, तो कभी अचानक किसी को झप्पी-पप्पी दे दें।
आजकल राजनीति में ट्रेंड ही ऐसा है—काम करो या न करो, धमाका ज़रूर करो ताकि पूरी दुनिया में हलचल मच जाए। मीडिया का ज़माना है, और मीडिया को विकास पुरुष नहीं चाहिए—उन्हें चाहिए एकदम विदूषक, जिसकी हरकत वायरल हो जाए। इसलिए नेता और मीडिया एक-दूसरे का ख़याल रखते हैं। मीडिया विकास नहीं दिखाता—वह दिखाता है कि नेता किसे चूम रहा है, किसके साथ घूम रहा है। कैमरे नेता को ढूँढते रहते हैं और नेता कैमरे में आने के लिए झूमते रहते हैं।
