वरिष्ठ कवि शिवाकान्त मिश्र 'विद्रोही' का 73वाँ अकादमिक जन्मदिवस आज
Today marks the 73rd academic birthday of senior poet Shivakant Mishra 'Vidrohi'.

स्वर्गीय पं. आद्याप्रसाद मिश्र एवं इतराज कुंअरि के सुपुत्र शिवाकान्त मिश्र 'विद्रोही' का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी (स्वामी कार्तिकेय जयंती) के पावन अवसर पर हुआ। उन्होंने छात्र जीवन से ही कविता लेखन प्रारंभ किया और आजीवन हिंदी साहित्य की सेवा करते हुए गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
श्री विद्रोही देशभर के काव्य मंचों पर अपनी ओजस्वी प्रस्तुतियों के लिए प्रसिद्ध हैं। हिंदी साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित 'साहित्य भूषण' सम्मान से अलंकृत किया है। उनके ओजपूर्ण खंडकाव्य "वीरभद्र" को मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के बी.ए. तृतीय वर्ष के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जा चुका है, जो गोंडा जनपद के लिए गर्व का विषय है।
उनकी रचनाओं का मूल स्वर सामाजिक शोषण, उत्पीड़न और आमजन के दुःख-दर्द से जुड़ा रहा है। कवि धर्म की महत्ता को भगवान शिव के आदर्श से जोड़ते हुए वे लिखते हैं— "जो अपने लिए जिया, उसका जीना भी कोई जीना है,
जीना उसका जिसने बांटी मुस्कानें, आँसू छीना है।
फिर मानव क्या, देवों में भी जो महादेव बनना चाहे,
उसको उठकर आगे बढ़कर शंकर जैसे विष पीना है।"
उत्तर प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग में राजपत्रित अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त श्री विद्रोही छात्र जीवन में एक जुझारू छात्र नेता भी रहे तथा उन्होंने राष्ट्रवादी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) में प्रादेशिक स्तर पर महत्वपूर्ण दायित्व निभाए।
अब तक उनकी चार काव्य कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका ऐतिहासिक शोध आधारित उपन्यास "जोधाबाई का डोला" शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा, जो वर्तमान में प्रकाशनाधीन है।
30 जून 1954 को जन्मे वरिष्ठ साहित्यकार शिवाकान्त मिश्र 'विद्रोही' आज गोंडा ही नहीं, पूरे हिंदी साहित्य जगत की गौरवशाली पहचान हैं। उनके अकादमिक जन्मदिवस पर साहित्य प्रेमियों ने उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सतत सृजनशील जीवन की मंगलकामनाएँ व्यक्त की हैं।
