विश्वकर्मा : सृजन, शिल्प और श्रम की भारतीय परंपरा
कुमार कृष्णन — विभूति फीचर्स
भारत में कुछ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होते, बल्कि वे सभ्यता की उस मूल चेतना को सामने लाते हैं, जिसने सदियों से समाज के जीवन को दिशा दी है। विश्वकर्मा पूजा ऐसा ही पर्व है। यह केवल औजारों, मशीनों, कारखानों और निर्माण स्थलों की पूजा का अवसर नहीं, बल्कि उस भारतीय दृष्टिकोण का उत्सव है जिसमें सृजन को साधना, श्रम को सम्मान और कौशल को संस्कृति का दर्जा दिया गया है।
धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा गया है। उन्हें देवताओं का वास्तुकार, निर्माण-कला का आचार्य और शिल्पविद्या का आदिगुरु माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं में दिव्य नगरों, भवनों, विमानों और अनेक अद्भुत संरचनाओं के निर्माण का श्रेय उन्हें दिया जाता है। पुष्पक विमान, इंद्रपुरी, त्रेतायुग की लंका, द्वापरयुग की द्वारका और हस्तिनापुर जैसी रचनाओं का संबंध भी धार्मिक आख्यानों में विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।
वास्तुशास्त्र, यंत्र निर्माण, धातु-कर्म और विभिन्न शिल्पकलाओं की परंपरा भी उनके नाम से जुड़ी हुई है। इन आख्यानों का ऐतिहासिक मूल्य अलग-अलग हो सकता है, लेकिन उनका सांस्कृतिक संदेश महत्वपूर्ण है। वे बताते हैं कि भारतीय मानस ने निर्माण और तकनीकी कौशल को महज भौतिक गतिविधि नहीं माना। सृजन को साधना और शिल्पी को सृष्टि के सह-रचनाकार के रूप में देखने की दृष्टि विकसित हुई।
विश्वकर्मा पूजा इसी सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक औद्योगिक और तकनीकी युग से जोड़ती है।
देवघर में आस्था और स्थापत्य की लोकस्मृति
विश्वकर्मा परंपरा की एक रोचक कड़ी देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम से भी जुड़ी है। धार्मिक लोकविश्वास के अनुसार बाबा बैद्यनाथ धाम के मंदिर और परिसर के कुछ प्रमुख मंदिरों के निर्माण का संबंध देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा से माना जाता है। मंदिर के विश्वकर्मा-निर्मित होने की मान्यता आज भी स्थानीय धार्मिक परंपरा में प्रचलित है।
देवघर की लोककथाएं इस विश्वास को और रोचक बनाती हैं। एक मान्यता के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा पुष्पक विमान से आकाश मार्ग में विचरण कर रहे थे। इसी दौरान उनकी दृष्टि रावण द्वारा स्थापित पवित्र ज्योतिर्लिंग पर पड़ी। उन्होंने इस स्थान पर एक ही रात में पांच दिव्य मंदिरों का निर्माण करने का संकल्प लिया।
लोककथा के अनुसार सबसे पहले भगवान शिव का मंदिर बनाया गया। इसके बाद माता पार्वती, भगवान गणेश और संध्या मंदिर का निर्माण हुआ। इसके बाद विश्वकर्मा अपने लिए एक भव्य मंदिर बनाने लगे।
कथा में आगे आता है कि देवताओं के सामने यह प्रश्न था कि यदि विश्वकर्मा का मंदिर बाबा बैद्यनाथ के मंदिर से भी अधिक भव्य हो गया तो क्या होगा। लोकमान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने मुर्गे का रूप धारण कर समय से पहले ही बांग दे दी। बांग सुनकर विश्वकर्मा को लगा कि सुबह हो चुकी है और एक रात में निर्माण पूरा करने का उनका संकल्प अधूरा रह गया। उनका अपना मंदिर अधूरा रह गया, जिसे लोकपरंपरा में आज लक्ष्मी नारायण मंदिर से जोड़ा जाता है।
एक अन्य कथा में नारद मुनि द्वारा भगवान शिव को यह बताए जाने का प्रसंग मिलता है कि विश्वकर्मा उनसे भी अधिक भव्य मंदिर का निर्माण कर रहे हैं। कथा के अनुसार भगवान शिव ने अपने बाएं पैर के अंगूठे से उस मंदिर को दबा दिया। इसी कारण उसके स्वरूप के कुछ झुके और अधूरे दिखाई देने की लोकमान्यता है।
इन प्रसंगों को इतिहास के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोकआस्था और धार्मिक स्मृति के रूप में देखना अधिक उचित है। देवघर की विशेषता यही है कि यहां रावण, शिव, विष्णु और विश्वकर्मा से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं। बैद्यनाथ धाम की ज्योतिर्लिंग परंपरा भी रावण, शिव और विष्णु से संबंधित आख्यानों से जुड़ी है।
इस दृष्टि से देवघर में विश्वकर्मा की स्मृति केवल निर्माण की कथा नहीं, बल्कि आस्था और स्थापत्य के संगम का प्रतीक बन जाती है।

अंग की धरती पर श्रम और कौशल की परंपरा
यदि देवघर विश्वकर्मा की धार्मिक और स्थापत्य स्मृति को सामने लाता है, तो अंग जनपद उनकी परंपरा के सामाजिक और कर्मशील पक्ष को समझने का व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र प्रदान करता है।
अंग की धरती प्राचीन काल से व्यापार, कृषि, शिल्प और विभिन्न प्रकार के कर्म से जुड़ी रही है। यहां की लोकसंस्कृति में श्रम और कौशल जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। धातु-कर्म से लेकर हस्तशिल्प, निर्माण कार्य से लेकर कृषि उपकरणों तक, मनुष्य के हाथ और उसकी तकनीकी बुद्धि ने इस भूभाग के जीवन को आकार दिया।
समय बदला और औद्योगिक युग आया। पारंपरिक औजारों की जगह मशीनों ने लेनी शुरू की, लेकिन श्रम और कौशल की मूल चेतना समाप्त नहीं हुई। उसने केवल अपना रूप बदला।
इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मुंगेर का जमालपुर रेल कारखाना है।
जमालपुर में विश्वकर्मा पूजा की औद्योगिक विरासत
जमालपुर रेलवे कार्यशाला की स्थापना 1862 में हुई थी। यहां विश्वकर्मा पूजा ने समय के साथ एक विशिष्ट औद्योगिक परंपरा का रूप लिया। उपलब्ध स्थानीय अभिलेखीय सामग्री और समाचार रिपोर्टों के अनुसार, जमालपुर रेल कारखाने में देश के कई अन्य हिस्सों से अलग 16 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाने की परंपरा चली आ रही है। वर्ष 2024 की रिपोर्टों में भी इस परंपरा के जारी रहने का उल्लेख मिलता है।
यह तारीख जमालपुर की विशिष्ट पहचान से जुड़ गई है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विश्वकर्मा पूजा सामान्यतः 17 सितंबर के आसपास मनाई जाती है, वहीं जमालपुर रेल कारखाने में 16 सितंबर की परंपरा को अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा के रूप में बताया जाता है।
यह केवल पूजा की तारीख नहीं, बल्कि रेलवे की औद्योगिक विरासत और श्रम-संस्कृति की स्मृति भी है।
कभी विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर जमालपुर रेल कारखाना आम लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाता था। दूर-दराज से लोग मशीनों, रेल इंजनों और विशाल कार्यशाला की दुनिया को देखने पहुंचते थे। कर्मचारियों और उनके परिवारों के साथ-साथ शहर के आम नागरिकों के लिए भी यह आयोजन उत्सव का रूप ले लेता था।
उस दृश्य में विश्वकर्मा पूजा का व्यापक अर्थ दिखाई देता था—एक ओर धार्मिक आस्था और दूसरी ओर आधुनिक इंजीनियरिंग; एक ओर देवशिल्पी विश्वकर्मा की पूजा और दूसरी ओर लोहे, इस्पात, भट्ठियों, मशीनों तथा रेल तकनीक के बीच काम करते हजारों हाथ।
मशीन से अधिक महत्वपूर्ण है उसे चलाने वाला हाथ
यहीं विश्वकर्मा पूजा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।
जिस औजार से निर्माण होता है, वह पूजनीय है। जिस मशीन से उत्पादन होता है, वह पूजनीय है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह मानवीय श्रम है, जो मशीन को संचालित करता है और निर्माण को संभव बनाता है।
विश्वकर्मा की भारतीय अवधारणा इसलिए आज के आधुनिक भारत में भी प्रासंगिक है। आज मशीनें पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुकी हैं। रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग ने उत्पादन की दुनिया को बदल दिया है। इसके बावजूद प्रत्येक तकनीक के पीछे मनुष्य की कल्पना, बुद्धि, कौशल और मेहनत मौजूद है।
विश्वकर्मा पूजा इसी मानवीय रचनात्मक शक्ति की याद दिलाती है।
यह पर्व इंजीनियर का सम्मान करता है, कारीगर का सम्मान करता है, लोहार और बढ़ई का सम्मान करता है, मशीन ऑपरेटर और तकनीशियन का सम्मान करता है और उस प्रत्येक हाथ को सम्मान देता है जो किसी वस्तु को आकार देता है।
कर्म को साधना मानने की भारतीय दृष्टि
भारतीय चिंतन में कर्म का विशेष महत्व रहा है। कर्म केवल जीविका कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और साधना का मार्ग भी हो सकता है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा कर्मयोग और शिल्प-साधना के बीच सांस्कृतिक सेतु का निर्माण करती है।
देवघर की लोककथा में विश्वकर्मा एक रात में मंदिर बनाने वाले देवशिल्पी हैं। अंग की सांस्कृतिक स्मृति में वे शिल्प और कर्म की चेतना के प्रतीक दिखाई देते हैं। वहीं जमालपुर में यही विश्वकर्मा आधुनिक औद्योगिक भारत के लोहे और मशीनों के बीच स्मरण किए जाते हैं।
देवताओं के लिए नगरों और दिव्य संरचनाओं का निर्माण करने वाले विश्वकर्मा जब आधुनिक युग में याद किए जाते हैं, तो उनके हाथ में केवल दिव्य हथौड़ा नहीं होता। वे मनुष्य की रचनात्मक क्षमता, तकनीकी बुद्धि और श्रम की गरिमा के प्रतीक बन जाते हैं।
विश्वकर्मा पूजा का आधुनिक संदेश
आज विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर यदि हम केवल मशीनों पर फूल चढ़ाकर आगे बढ़ जाएं, तो इस पर्व के अर्थ का एक बड़ा हिस्सा अनदेखा रह जाएगा। वास्तविक श्रद्धांजलि तब होगी, जब हम श्रम की गरिमा को स्वीकार करें, कारीगर के कौशल को सम्मान दें और तकनीकी शिक्षा तथा हुनर को समाज में प्रतिष्ठा प्रदान करें।
किसी भी सभ्यता की ऊंचाई केवल उसके मंदिरों, महलों या कारखानों से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक पहचान इस बात से भी होती है कि वह निर्माण करने वाले हाथों का कितना सम्मान करती है।
देवघर का बैद्यनाथ धाम हमें आस्था और स्थापत्य के मिलन की लोकस्मृति से जोड़ता है। अंग की धरती कर्म और कौशल की पुरानी परंपरा की याद दिलाती है। जमालपुर रेल कारखाना इसी चेतना का आधुनिक औद्योगिक रूप सामने रखता है।
इन तीनों को एक साथ देखें तो विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रह जाती। यह बन जाती है—
सृजन का उत्सव,
श्रम का सम्मान,
कौशल का अभिनंदन
और मनुष्य की रचनात्मक शक्ति को नमन।
आज के तकनीकी और औद्योगिक दौर में शायद यही विश्वकर्मा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
