हिन्दी साहित्य के बहुआयामी व्यक्तित्व डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’

Dr. Vishnu Kishore Jha 'Bechan', a multifaceted personality of Hindi literature
 
यह सम्मान उन्हें उनकी प्रमुख कृतियों—नाटक ‘जल नाद’, संस्मरण ‘काशी काबा दोनों पूरब में हैं जहां से’, जीवनी-ग्रंथ ‘भगत सिंह’ और ‘ऊधम सिंह’, शोधकृति ‘मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर’ तथा ‘व्यंग्य: कल आज और कल’ के लिए प्रदान किया जा रहा है।  डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’: हिंदी साहित्य के सारस्वत व्यक्तित्व  कुमार कृष्णन (विभूति फीचर्स): हिंदी साहित्य जगत के बहुआयामी व्यक्तित्व डाॅ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ बिहार के साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक जीवन के उज्ज्वल सितारे रहे। वे एक समर्थ समीक्षक, साहित्यकार, प्रखर चिंतक, शिक्षक और साहित्यिक आंदोलनकारी के रूप में चार दशकों तक सक्रिय रहे।  उनका साहित्यिक अवदान कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण और नाटक जैसी सभी विधाओं में रहा। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘अध्ययन के विचार’, ‘आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य और चरित्र विकास’, ‘समकालीन साहित्य और समीक्षा’, ‘प्रेमचंद’ (आलोचना), ‘मेरी प्रिय कहानियां’, ‘जेल के अंतराल से’ और ‘बसेरा’ (नाटक) प्रमुख हैं। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य को आधुनिक दृष्टिकोण और नए प्रतिमान देने वाली मानी जाती हैं।  1955 में एम.ए. और 1963 में पीएच.डी. उपाधि प्राप्त कर वे भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी बने। अपने शैक्षिक जीवन में उन्होंने भगवान पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष से लेकर प्राध्यापक, विभागाध्यक्ष, प्राचार्य और विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति तक का सफर तय किया।  साहित्यिक आयोजनों और पुस्तकालय आंदोलन को नई दिशा देने में उनका योगदान अमूल्य रहा। भगवान पुस्तकालय को उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई और बिहार राज्य पुस्तकालय संघ की स्थापना कर आजीवन अध्यक्ष रहे।  उनकी चर्चित कहानी ‘भात’ (1957) आज भी हिंदी की पांक्तेय कहानियों में शुमार की जाती है। वहीं, ‘भागलपुर भागता हुआ शहर’ जैसी रचना ने हिंदी कहानी को नई शैली प्रदान की। नाटक ‘बसेरा’ का बार-बार रेडियो प्रसारण उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक गहराई का प्रमाण है।  4 सितम्बर 1933 को जन्मे डॉ. बेचन 30 अगस्त 2004 को इस दुनिया से विदा हो गए। वे जीवनपर्यंत साहित्य और समाज के लिए समर्पित रहे और अपनी मौलिकता, आलोचनात्मक दृष्टि तथा मानवीय संवेदनाओं के कारण हिंदी जगत में अमर रहेंगे।

कुमार कृष्णन – विभूति फीचर्स

डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ बिहार के साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक जगत के एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे। वे न केवल एक प्रतिष्ठित शिक्षक और चिंतक रहे, बल्कि साहित्य की लगभग सभी विधाओं—कविता, कहानी, आलोचना, नाटक और संस्मरण—में अपनी कलम से अमिट छाप छोड़ गए।

उनका स्वभाव सरल, सहज और सदैव मुस्कुराता हुआ था। यही कारण था कि लोग उन्हें केवल विद्वान नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत एक साधु-स्वभाव वाले साहित्यकार के रूप में भी याद करते हैं।

साहित्य और आलोचना में योगदान

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में वे मौलिक समालोचक के रूप में प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक धारणाओं से परे रहकर उन्होंने आधुनिक मूल्यों को अपनाया और नए प्रतिमानों को स्थापित किया। ‘आलोचना’ पत्रिका सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित हुए। नागार्जुन और पंत पर उनकी समीक्षाएँ हिंदी आलोचना में मील का पत्थर मानी जाती हैं।

उनकी चर्चित कृतियों में शामिल हैं –

  • अध्ययन के विचार

  • आधुनिक हिंदी कथा साहित्य और चरित्र विकास

  • समकालीन साहित्य और समीक्षा

  • प्रेमचंद (आलोचना)

  • इंसान की लाश (कहानी संग्रह)

  • जेल के अंतराल से (उपन्यास)

  • बसेरा (नाटक)
    साथ ही उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों और ग्रंथों का संपादन भी किया।

उनकी कहानी ‘भात’ (1957) हिंदी की प्रतिनिधि कहानियों में गिनी जाती है, वहीं ‘भागलपुर भागता हुआ शहर’ (1971) ने हिंदी कहानी को एक नई शैली दी। उनका नाटक ‘बसेरा’ वर्षों तक आकाशवाणी से प्रसारित होता रहा और पाठकों-श्रोताओं के बीच लोकप्रिय रहा।

शिक्षण और संस्थागत योगदान

4 सितम्बर 1933 को भागलपुर में जन्मे डॉ. बेचन ने 1955 में एमए और 1963 में पीएचडी की उपाधि हासिल कर भागलपुर विश्वविद्यालय के पहले डॉक्टरेट का गौरव पाया। वे व्याख्याता, प्राचार्य और अंततः विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति तक रहे।

उन्होंने बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की और बिहार राज्य पुस्तकालय संघ का गठन कर जीवन भर उसे दिशा दी। उनके प्रयासों से भगवान पुस्तकालय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना।

जीवन और विरासत

साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में डॉ. बेचन की सक्रियता चार दशकों तक रही। वे प्रगतिशील विचारों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं के भी समर्थक थे। उनका मानना था कि साहित्य समाज का दर्पण है और इसमें विषमता और संघर्ष की झलक अवश्य होनी चाहिए।

30 अगस्त 2004 को उनका निधन हो गया, किंतु वे आज भी अपनी रचनाओं और संस्थागत योगदान के कारण साहित्य-प्रेमियों की स्मृतियों में जीवित हैं। वे सचमुच हिंदी साहित्य के ऐसे सारस्वत व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने विचार और कर्म से नई पीढ़ी को प्रेरणा दी।

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