“जल संरक्षण केवल आज की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी” : राजेंद्र सिंह
(कुमार कृष्णन - विभूति फीचर्स)
सूखी नदियों को पुनर्जीवित करने और रेगिस्तान में जल संरक्षण की मिसाल कायम करने वाले प्रसिद्ध पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह को देश-दुनिया में ‘जल पुरुष’ के नाम से जाना जाता है। उनका मानना है कि “धरती की प्यास तभी बुझेगी और मानवता तभी बचेगी, जब हम पानी की हर बूंद को सहेजना और प्रकृति का सम्मान करना सीख जाएंगे।”
उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के डौला गांव में जन्मे राजेंद्र सिंह ने सरकारी नौकरी और आधुनिक जीवन की सुविधाओं को छोड़कर जल संकट से जूझ रहे ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने का संकल्प लिया। उनकी संस्था तरुण भारत संघ ने राजस्थान के अलवर और आसपास के क्षेत्रों में जोहड़, तालाब और चेक डैम जैसी पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों को पुनर्जीवित कर सूखी नदियों में फिर से जीवन प्रवाहित किया।

उनके प्रयासों से अरवरी, रूपारेल, सरसा, भगानी और जहाजवाली जैसी नदियां दोबारा बहने लगीं और हजारों एकड़ बंजर भूमि हरी-भरी हो गई। जल संरक्षण और सामुदायिक नेतृत्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें वर्ष 2001 में प्रतिष्ठित Ramon Magsaysay Award तथा 2015 में Stockholm Water Prize से सम्मानित किया गया।
“नदियों का मरना सभ्यता के संकट का संकेत”
देश में नदियों की बिगड़ती स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज नदियां गंभीर रूप से बीमार हैं, लेकिन उनके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए प्रभावी कानूनों का अभाव है।
उन्होंने कहा, “नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार हैं। आज अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण नदियां अपनी पहचान खो रही हैं। कहीं वे सूख रही हैं, तो कहीं बाढ़ और विनाश का कारण बन रही हैं। नदियों का मरना सभ्यता के संकट का संकेत है।”
उन्होंने कहा कि भारत तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहा है। अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों पर कब्जा और जलवायु परिवर्तन ने जल चक्र को असंतुलित कर दिया है, जिससे बाढ़ और सूखे की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।
“नदी पुनर्जनन को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना होगा”
राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदी पुनर्जनन केवल सफाई अभियान नहीं, बल्कि नदियों की प्राकृतिक और पारिस्थितिक संरचना को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है।
उन्होंने कहा कि नदियों को उनके प्राकृतिक प्रवाह के साथ सुरक्षित रखना, अतिक्रमण रोकना, प्रदूषण नियंत्रित करना और जल के संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
उनके अनुसार ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना जल संरक्षण संभव नहीं है। “नदी पंचायत” और “क्षेत्र सभा” जैसी व्यवस्थाएं जल संरक्षण को जन आंदोलन बना सकती हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि जल निकायों में अतिक्रमण, अवैध खनन और प्रदूषण पर कठोर कानून बनने चाहिए। साथ ही वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन को प्राथमिकता देनी होगी।
अरावली संरक्षण पर बोले ‘जल पुरुष’
अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहे आंदोलनों पर राजेंद्र सिंह ने कहा कि अरावली केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत है।
उन्होंने बताया कि तरुण भारत संघ ने 1988 से अरावली में हो रहे अंधाधुंध खनन और जंगल विनाश के खिलाफ अभियान शुरू किया था। इसके बाद 1991 में उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई, जिसके परिणामस्वरूप सरिस्का क्षेत्र की सैकड़ों खदानें बंद हुईं।
उन्होंने कहा कि जहां खनन रुका, वहां जल स्रोत लौटे, जंगल बढ़े और भूजल स्तर में सुधार हुआ। लेकिन बाद के वर्षों में कई स्थानों पर अवैध खनन फिर शुरू हो गया, जिससे पर्यावरणीय संकट और गहरा गया।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अरावली को राज्यों की सीमाओं में बांटकर नहीं देखा जा सकता। यह एक अखंड पर्वतमाला है, जिसके जंगल, जल स्रोत और जैव विविधता का संरक्षण समान रूप से आवश्यक है।
“प्रकृति, संस्कृति और संविधान का संतुलन जरूरी”
भविष्य की रणनीति पर उन्होंने कहा कि जल, जंगल और पहाड़ों को बचाने के लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रकृति, संस्कृति और संविधान के समन्वय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जब तक समाज पंचमहाभूतों—जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश—के साथ संतुलन बनाकर चलता रहा, तब तक जीवन और अर्थव्यवस्था दोनों मजबूत रहे।
राजेंद्र सिंह ने बताया कि 22 और 23 मई को जमशेदपुर, झारखंड में ‘राष्ट्रीय पर्वत एवं नदी सम्मेलन’ आयोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय कानून का प्रारूप तैयार कर केंद्र सरकार को सौंपना है।
उन्होंने कहा, “जल संरक्षण केवल वर्तमान की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। नदियों और पहाड़ों को बचाना ही भविष्य को बचाना है।”
