जल संरक्षण अब राष्ट्र धर्म, बूंद-बूंद सहेजने से ही होगा जल-समृद्ध भारत का निर्माण

Opinion: Water Conservation Is Now a National Duty; A Water-Rich India Will Be Built Only by Conserving Every Single Drop.
 
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CM Dr. Mohan Yadav Article on Water Conservation:भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में प्रकृति के तत्वों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वरीय रूप माना गया है। हमारे देश में नदियां मात्र जल के स्रोत नहीं हैं, वे जीवनदायिनी और चेतना की देवियां हैं। नदियों में भी मां गंगा का स्थान सर्वोपरि और वंदनीय है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला 'गंगा दशहरा' या 'गंगावतरण' केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह पावन दिन जल की महत्ता को स्वीकार करने और प्रकृति के प्रति अपनी सामूहिक कृतज्ञता प्रकट करने का एक महान उत्सव है।

पवित्र और स्वच्छ जल के इसी सांस्कृतिक महत्व को समझते हुए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने जल संरक्षण को एक नए भारत के 'राष्ट्रीय जन आंदोलन' में तब्दील कर दिया है। उन्होंने जल की उपलब्धता को देश के विकास का मुख्य मापदंड (Parameter) बनाते हुए "हर घर जल" और "जल है तो कल है" के संकल्प को धरातल पर उतारा है।

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देश को जल सुरक्षा देने वाली केंद्र सरकार की 5 ऐतिहासिक पहलें

प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में देश की जल नीति में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। इसके लिए कई युगांतरकारी कदम उठाए गए हैं:

  1. जल शक्ति मंत्रालय का गठन: देश के इतिहास में पहली बार जल प्रबंधन से जुड़े सभी विभागों को एकीकृत कर एक समर्पित मंत्रालय बनाया गया।

  2. अमृत सरोवर मिशन (आजादी का अमृत महोत्सव का हिस्सा): जल संरक्षण को नया आयाम देने के लिए देश के प्रत्येक जिले में 75 भव्य जलाशयों के निर्माण या जीर्णोद्धार का लक्ष्य रखा गया था। इसके तहत अब तक 70 हजार से अधिक अमृत सरोवर बनकर तैयार हो चुके हैं, जिन्होंने वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और भूजल स्तर को सुधारने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है।

  3. नमामी गंगे और सीवेज ट्रीटमेंट: गंगा नदी को निर्मल बनाने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, रिवर फ्रंट विकास और नदी की जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण पर युद्ध स्तर पर कार्य हुआ।

  4. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: कृषि क्षेत्र में पानी की बर्बादी रोकने के लिए "प्रति बूंद अधिक फसल" (More Crop Per Drop) का मंत्र दिया गया, जिसके तहत देश भर में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को तेजी से बढ़ावा मिला।

  5. कैच द रेन अभियान: "जहां भी गिरे और जब भी गिरे, वर्षा जल को समेटें" के विजन के साथ लाखों चेकडैम, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और पारंपरिक कूपों का कायाकल्प किया गया।

इस विजन का परिणाम आज देश में साफ दिख रहा है; अत्यधिक दोहन (Over-Exploited) वाली जल इकाइयों की संख्या घटी है और देश के सैकड़ों जिलों में गहराता जल संकट अब धीरे-धीरे कम हो रहा है।

मध्यप्रदेश का महा-अभियान: 'जल गंगा संवर्धन अभियान'

प्राकृतिक जल संपदा और नदियों के मायके के रूप में विख्यात मध्यप्रदेश, जल संरक्षण की दिशा में देश के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश कर रहा है। राज्य में 'जल गंगा संवर्धन अभियान' को एक व्यापक राज्य स्तरीय जन आंदोलन का रूप दिया गया है।

  • निरंतरता और विजन: वर्ष 2025 में यह अभियान 19 मार्च से 30 जून तक पूरी ताकत से चलाया गया था। वर्तमान वर्ष 2026 में भी यह अभियान पूरे प्रदेश में जन-भागीदारी के साथ चरम पर है। इसका मुख्य ध्येय मध्य प्रदेश को पूरी तरह जल संकट से मुक्त बनाना है।

  • धरातल पर व्यापक कार्य: अभियान के अंतर्गत सूबे की नदियों, पारंपरिक तालाबों, ऐतिहासिक कुओं, प्राचीन बावड़ियों और चेकडैम का जीर्णोद्धार, गहरीकरण और स्वच्छता कार्य किया जा रहा है।

  • बजट और संरचनाएं: राज्य में लगभग 2,500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके तहत 10 हजार से अधिक चेकडैम और स्टॉपडैम का संधारण (Maintenance) किया जा रहा है और हजारों तालाबों को गहरा किया जा रहा है। इसमें ग्राम पंचायतों, नगरीय निकायों, युवाओं और मातृशक्ति (महिलाओं) की सक्रिय भूमिका तय की गई है।

कृषि प्रधान मध्यप्रदेश के लिए जल संरक्षण का आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व

 किसानों की समृद्धि और अर्थव्यवस्था का आधार

मध्यप्रदेश मूलतः एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां के किसानों की खुशहाली सीधे तौर पर पानी की उपलब्धता से जुड़ी है। अनियमित मानसून, बढ़ती आबादी और गिरते भूजल स्तर की चुनौतियों का मुकाबला यह अभियान बखूबी कर रहा है। 'रिज-टू-वैली मॉडल' और 'खेत तालाब योजना' से किसानों की सिंचाई क्षमता बढ़ी है, जिससे फसलों का उत्पादन और उनकी आय दोगुनी हो रही है।

 सांस्कृतिक धरोहरों का पुनरुद्धार और पर्यटन

प्रदेश की प्राचीन बावड़ियां, चंदेलकालीन व गोंदकालीन तालाब हमारी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत हैं। इस अभियान के माध्यम से इनका जीर्णोद्धार कर न केवल हम अपने सांस्कृतिक गौरव को वापस पा रहे हैं, बल्कि इन क्षेत्रों को स्थानीय पर्यटन केंद्रों के रूप में भी विकसित कर रहे हैं।

 'पानी चौपाल' से आ रहा है वैचारिक बदलाव

यह अभियान केवल फाइलों या सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं है। 'पानी चौपाल' जैसे सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को कम पानी वाली फसलों को उगाने, आधुनिक ड्रिप सिंचाई तकनीकों को अपनाने की कूटनीतिक और तकनीकी जानकारी दी जा रही है। इससे समाज में जल को सहेजने की एक नई आदत और संस्कृति विकसित हो रही है।

वर्तमान का संकल्प, भविष्य की समृद्धि

प्रधानमंत्री जी के कुशल मार्गदर्शन में जल संरक्षण अब महज एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक अनिवार्य हिस्सा और हमारा 'राष्ट्र धर्म' बन चुका है। मध्यप्रदेश आज इस दिशा में अग्रणी राज्य बनकर उभर रहा है। सूबे की नदियों का पुनः प्रवाह और अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में हुई रिकॉर्ड वृद्धि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

एक स्वच्छ, आत्मनिर्भर और जल-सम्पन्न मध्यप्रदेश का स्वप्न तभी पूरी तरह साकार होगा, जब प्रदेश का हर नागरिक जल की एक-एक बूंद को सहेजने को अपना परम कर्तव्य मानेगा। आज हम जल स्रोतों की रक्षा करेंगे, तभी हमारी आने वाली पीढ़ियां एक समृद्ध और सुरक्षित भारत का उपभोग कर सकेंगी।

(लेखक, डॉ. मोहन यादव, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

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