युद्धोन्माद से कैसा शांति संदेश
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इतिहास साक्षी है कि युद्ध केवल तबाही का अध्याय लिखते हैं, सृजन का नहीं। हाल ही में अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान की इस्लामिक क्रांति का चेहरा रहे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु की खबर ने विश्व समुदाय को स्तब्ध कर दिया। शिया समुदाय में शोक स्वाभाविक है, किन्तु वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न और भी गंभीर है कि युद्धोन्माद के इस वातावरण में प्रभुत्ववादी शक्तियाँ विश्व को कौन-सा शांति संदेश देना चाहती हैं।
भारत जैसे पंथनिरपेक्ष देश में भी इस संघर्ष पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। शिया बाहुल्य क्षेत्रों में प्रदर्शन हुए और अमेरिका व इज़रायल के विरोध में नारे लगे। यह स्पष्ट नहीं है कि इस संघर्ष के लिए किसे उत्तरदायी ठहराया जाए, परंतु इतना निश्चित है कि विश्व एक भयावह दिशा की ओर बढ़ रहा है। शक्ति के दंभ में अन्य राष्ट्रों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को चुनौती देना किसी भी दृष्टि से मानवीय कृत्य नहीं कहा जा सकता।
जब विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों की प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं तो विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता का उल्लंघन बताया, जबकि स्वयं रूस-यूक्रेन संघर्ष विश्व के सामने है। चीन, जिस पर विस्तारवादी नीतियों के आरोप लगते रहे हैं, वह भी अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई देता नजर आता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या वैश्विक राजनीति में नैतिकता केवल परिस्थितिजन्य उपकरण बनकर रह गई है?
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और मानवाधिकार संगठन इस प्रकार के युद्धोन्माद को रोकने में कितनी प्रभावी भूमिका निभा पाएँगे, यह भविष्य के गर्भ में है। किंतु भारत जैसे देश के लिए यह आत्ममंथन का समय अवश्य है। जब विश्व अस्तित्व की चुनौती से जूझ रहा हो, तब आंतरिक स्तर पर जातीय, धार्मिक या वर्गीय विभाजन को बढ़ावा देना क्या उचित है?
भारत की अनेकता में एकता की परंपरा विश्व के लिए उदाहरण रही है। आज जब “विश्व मानव” की अवधारणा अधिक प्रासंगिक हो रही है, तब सभी प्रबुद्ध जनों का कर्तव्य है कि वे मानवता के विरुद्ध किसी भी कृत्य का विरोध करने के लिए एकजुट हों।युद्धोन्माद कभी शांति का संदेश नहीं दे सकता; शांति का मार्ग केवल संवाद, सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान से ही प्रशस्त होता है।
