जुबान भी क्या चीज है साब! कभी अपनों को मुर्दाबाद, तो कभी अपराध को क्राइम से अलग कर देती है
पवन वर्मा – विनायक फीचर्स जुबान भी क्या चीज है साब! बड़ी बेवफा होती है। कब साथ छोड़ दे, कब दिल की बात बाहर निकाल दे और कब अपने ही खेमे में हलचल मचा दे, इसका कोई भरोसा नहीं। आदमी लाख कोशिश कर ले कि जुबान पर लगाम रहे, लेकिन कई बार शब्द दिमाग से पहले दौड़ पड़ते हैं। आम आदमी की जुबान फिसले तो उसे सफाई देनी पड़ती है, मगर सियासत में ऐसा हो जाए तो सफाई देने वालों की पूरी फौज मैदान में उतर आती है। कोई इसे मानवीय भूल बताता है, कोई बयान को संदर्भ से काटने की बात करता है और कोई विरोधियों की साजिश करार देता है। सोशल मीडिया पर बैठे लोगों को तो बस ऐसे ही किसी मौके का इंतजार रहता है।
इन दिनों दो वीडियो चर्चा में हैं। दोनों में अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री नजर आते हैं। बोलने का अंदाज भले अलग हो, लेकिन जुबान की मेहरबानी दोनों पर एक जैसी दिखाई देती है। एक वीडियो में जिंदाबाद कहने की कोशिश के बीच मुर्दाबाद जैसा शब्द सुनाई दे जाता है। वह भी किसी विरोधी के लिए नहीं, बल्कि अपने ही खेमे के एक बड़े नेता के लिए। गलती का अहसास होते ही जिंदाबाद का नारा भी लगा दिया जाता है। यानी पहले जुबान ने अपना काम कर दिया और फिर दिमाग ने उसकी मरम्मत की कोशिश की। मगर तब तक कैमरा अपना काम पूरा कर चुका था।
अब कैमरे को क्या मालूम कि कौन अपना है और कौन पराया। वह न पार्टी का सदस्य है, न संगठन का पदाधिकारी और न ही किसी गुट का समर्थक। उसे तो सिर्फ वही रिकॉर्ड करना है, जो उसके सामने घट रहा है। कैमरे की सबसे बड़ी खूबी और खामी यही है कि वह बोलने वाले की नीयत नहीं पढ़ता, बल्कि उसके मुंह से निकले शब्दों को ज्यों का त्यों दर्ज कर लेता है।
वीडियो सामने आते ही कयासों का बाजार गर्म हो गया। कोई इसे जुबान फिसलना बता रहा है तो कोई मन की बात बाहर आने का मामला। कुछ लोग बार-बार वीडियो सुनकर यह तय करने में जुटे हैं कि आखिर पहला शब्द क्या था और दूसरा कौन-सा। लगता है कि अब राजनीतिक भाषणों के विश्लेषण के लिए राजनीतिक पंडितों के साथ भाषाई विशेषज्ञों की भी जरूरत पड़ने वाली है। वैसे भी सियासत में कौन किसके साथ है, यह समझना आसान नहीं। मंच पर गले मिलते नेता बंद कमरों में एक-दूसरे से नजरें चुराते दिख सकते हैं। ऐसे में जुबान अगर एक बार मन की बात कह दे तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।
दूसरा वीडियो भी कम दिलचस्प नहीं है। यहां मामला जुबान फिसलने का नहीं, बल्कि शब्दों के अर्थ बदलने का है। दावा किया गया कि अपराध खत्म हो गए हैं, लेकिन क्राइम हो सकता है। अब भाषा भी इतनी राजनीतिक हो सकती है, यह शायद हिंदी और अंग्रेजी के शब्दकोशों को भी पहली बार पता चला होगा। बरसों से अपराध और क्राइम को एक ही समस्या के दो नाम माना जाता रहा है। पुलिस दोनों पर कार्रवाई करती है, अदालतें दोनों को कानून की कसौटी पर परखती हैं और जेलों में दोनों के आरोपी पहुंचते हैं। लेकिन नई व्याख्या ने भाषा के साथ-साथ व्यवस्था के सामने भी एक नई बहस खड़ी कर दी है।
इस हिसाब से तो पुलिस थानों में भी नई व्यवस्था लागू की जा सकती है। हिंदी में कोई वारदात हो तो उसे अपराध की श्रेणी में न रखा जाए और अंग्रेजी में हो तो क्राइम मान लिया जाए। हिंदी में प्रदेश को अपराध मुक्त बताने का दावा कायम रहेगा और अंग्रेजी में क्राइम पर नियंत्रण की कोशिशें जारी रहेंगी। सरकारी विज्ञप्तियों में भी सुविधा हो जाएगी—हिंदी में प्रदेश अपराध मुक्त और अंग्रेजी में क्राइम कंट्रोल की मुहिम। आंकड़ों का प्रबंधन भी आसान और दावों की सेहत भी दुरुस्त!
अपराधियों को भी इस भाषाई सुविधा का लाभ मिल सकता है। कोई हिंदी में अपराध करने से पहले सोच सकता है कि जब अपराध ही नहीं है तो डर किस बात का। हालांकि पुलिस और अदालत के सामने अंग्रेजी का सहारा लेने पर भी मुश्किल हो सकती है, क्योंकि वहां शब्दों से ज्यादा सबूतों की अहमियत होती है। मगर राजनीति में कई बार सबूतों से ज्यादा शब्दों की उम्र लंबी हो जाती है। यहां एक बयान उपलब्धि बन जाता है और दूसरा बयान उसी उपलब्धि की परिभाषा बदल देता है।
नेताओं की जुबान और सरकारी शब्दावली का रिश्ता भी बड़ा पुराना है। चुनाव के समय वादे किए जाते हैं, सत्ता में आने के बाद उन्हें संकल्प कहा जाता है। काम शुरू हो जाए तो उपलब्धि और अधूरा रह जाए तो प्रक्रिया। महंगाई बढ़े तो वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार, बेरोजगारी हो तो युवाओं के लिए अवसरों की तैयारी और व्यवस्था में गड़बड़ी हो तो पिछली सरकारों की विरासत। शब्दों का ऐसा कुशल इस्तेमाल हो तो फिर अपराध और क्राइम में फर्क निकालना कौन-सी बड़ी बात है!
इन दोनों वीडियो में भी यही दिलचस्पी है। एक में जुबान अपने-पराये का फर्क भूल गई तो दूसरे में अपराध और क्राइम के बीच अंतर समझाने की कोशिश में भाषा ही नई राह पर निकल पड़ी। बोलने वालों को शायद अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके शब्द कितनी दूर तक पहुंचेंगे। मगर अब जमाना बदल चुका है। पहले नेता भाषण देते थे, जनता सुनती थी और अगले दिन अखबारों में उसका सार छपता था। अब नेता बोलते हैं और मोबाइल कैमरे उनकी हर बात का हिसाब रखने लगते हैं। मंच पर हुई छोटी-सी चूक भी कुछ ही मिनटों में लाखों मोबाइल तक पहुंच जाती है।
सोशल मीडिया का अपना अलग न्यायशास्त्र है। यहां न अदालत की तारीख लगती है, न गवाह बुलाए जाते हैं और न सफाई का इंतजार होता है। दस सेकंड का वीडियो सामने आया नहीं कि फैसला तैयार। समर्थक कहेंगे जुबान फिसली, विरोधी कहेंगे दिल की बात निकली और बाकी लोग मीम बनाकर अपनी रचनात्मकता दिखाने लगेंगे। किसी को जिंदाबाद में मुर्दाबाद सुनाई देगा तो किसी को अपराध और क्राइम के बीच नया दर्शन नजर आएगा। देखते ही देखते गंभीर राजनीतिक चर्चा मनोरंजन का कार्यक्रम बन जाती है।
मजेदार बात यह है कि नेता जब अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं तो उन्हें जनता तक पहुंचाने के लिए पूरी मशीनरी लगानी पड़ती है। विज्ञापन, पोस्टर, सोशल मीडिया अभियान और प्रेस नोट तक जारी होते हैं। लेकिन जुबान से एक गलत शब्द निकल जाए तो प्रचार अपने आप हो जाता है। न विज्ञापन का खर्च, न प्रचार एजेंसी की जरूरत और न ही किसी अभियान की योजना। वीडियो खुद अपनी मार्केटिंग कर लेता है। शायद इसीलिए आजकल नेताओं के भाषणों से ज्यादा उनके वायरल होने की संभावनाओं पर नजर रखी जाने लगी है।
हालांकि हर जुबानी चूक को मन की बात मान लेना भी उचित नहीं। मंच पर बोलते समय शब्द बदल सकते हैं, नाम गलत निकल सकते हैं और उत्साह में नारे गड़बड़ा सकते हैं। आखिर नेता भी इंसान हैं, मशीन नहीं। लेकिन परेशानी तब होती है, जब गलती सुधारने के बजाय उसके बचाव में नई-नई व्याख्याएं पेश होने लगती हैं। गलती छोटी होती है और सफाई बड़ी। बयान दस सेकंड का होता है, मगर उसका बचाव दस दिन तक चलता है। कभी-कभी सफाई सुनकर लगता है कि मूल गलती से बड़ा राजनीतिक चमत्कार उसकी व्याख्या में ही हो गया।
सत्ता में बैठे लोगों के लिए शब्दों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा होती है। मुख्यमंत्री के मुंह से निकला एक शब्द महज व्यक्तिगत राय नहीं रह जाता। लोग उसमें राजनीतिक रिश्ते तलाशते हैं, प्रशासनिक संदेश खोजते हैं और सरकार की सोच का अंदाजा लगाने लगते हैं। इसलिए बोलने से पहले थोड़ा ठहर जाना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। मंच पर माइक भले एक हो, लेकिन रिकॉर्डिंग करने वाले कैमरे सैकड़ों होते हैं। उनमें से किसी को यह निर्देश नहीं दिया जा सकता कि आज अपने लोगों की इज्जत का सवाल है, इसलिए यह हिस्सा रिकॉर्ड मत करना।
जनता को भी अब नेताओं की भाषाई कसरत से ज्यादा मतलब नहीं रह गया है। उसे इस बात से फर्क पड़ता है कि थाने में उसकी शिकायत सुनी जा रही है या नहीं, सड़क पर सुरक्षा है या नहीं और अपराधियों पर कार्रवाई हो रही है या नहीं। अपराध को क्राइम कह देने से अपराध कम नहीं होता और मुर्दाबाद को जिंदाबाद से ढक देने से राजनीतिक रिश्तों की गांठें नहीं खुलतीं। शब्दों की मरम्मत कैमरे के सामने हो सकती है, लेकिन जमीन पर व्यवस्था सुधारने के लिए काम करना पड़ता है।
बहरहाल, सियासत में जुबान का अपना अलग ही जलवा है। कभी वह अपने ही खेमे को मुर्दाबाद कह बैठती है, कभी अपराध को क्राइम से अलग कर देती है और कभी उपलब्धियों के ऐसे अर्थ निकाल देती है कि शब्दकोश भी हैरान रह जाए। नेता भले कहें कि बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है, लेकिन बात इतनी सी है कि अब बोलने से पहले सोचना और बोलने के बाद अपने शब्दों की जिम्मेदारी लेना, दोनों जरूरी हो गए हैं।
आखिर जुबान है साब, कोई सरकारी फाइल थोड़े ही है कि गलती पकड़ में आते ही नोटशीट बदल दी जाएगी। कैमरा भी कोई पार्टी कार्यकर्ता नहीं कि कहने पर पुराना बयान वापस ले लेगा। वह तो चुपचाप सब रिकॉर्ड करता रहेगा। नेता आज जिंदाबाद कहें या मुर्दाबाद, अपराध कहें या क्राइम—सोशल मीडिया के पास हर शब्द का हिसाब रहेगा। इसलिए अगली बार मंच पर माइक संभालें तो जरा जुबान भी संभाल लें। क्योंकि सियासत में कुर्सी कब किसकी हो जाए, यह तो पता नहीं, लेकिन जुबान की फिसलन का वीडियो कब वायरल हो जाए, इसकी गारंटी जरूर है!
