अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?
डॉ. सुधाकर आशावादी | विनायक फीचर्स
“बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था,
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है—अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?”
कम शब्दों में गहरी बात कह देना साहित्यकार की पहचान होती है। उपरोक्त पंक्तियाँ केवल एक शेर नहीं, बल्कि आज के समय का तीखा यथार्थ भी हैं। उल्लू को विनाश का प्रतीक मानना कितना वैज्ञानिक है, यह बहस का विषय हो सकता है, किंतु जब देश की वर्तमान परिस्थितियों पर दृष्टि डालते हैं, तो यह प्रतीकात्मक सत्य सजीव प्रतीत होता है।

जिन लोगों पर देश ने भरोसा किया था कि वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे, वही आज संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों में उलझकर लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुँचा रहे हैं। यदि ऐसा न होता, तो संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर मुद्दों से भटकती बहसें न होतीं। बजट सत्र जैसे गंभीर अवसर पर, जहाँ आर्थिक नीतियों की अच्छाइयों और कमियों पर सार्थक विमर्श अपेक्षित होता है, वहाँ अप्रमाणिक और अनावश्यक मुद्दों के जरिए समय की बर्बादी नहीं की जाती।
समाज में समरसता बनाए रखने के लिए जिन अलगाववादी प्रवृत्तियों और प्रावधानों का सामूहिक विरोध होना चाहिए था, उन्हीं पर राजनीतिक चुप्पी सबसे अधिक खलती है। विडंबना यह है कि जो नेता हर बात पर सदन को बाधित करने में अग्रणी रहते हैं, वे “सबका साथ, सबका विकास” जैसी समावेशी अवधारणा पर सकारात्मक संवाद से बचते नजर आते हैं। इससे यह आभास होता है कि आम नागरिक की समस्याएँ न सत्ता पक्ष की प्राथमिकता हैं, न विपक्ष की चिंता।
कभी देश को साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बनाया जाता है, तो कभी जातीय विभाजन की। सत्ता में बैठे लोग सत्ता के नशे में इतने डूबे हैं कि नारे तो याद हैं, लेकिन उन्हें ज़मीनी हकीकत में बदलने की इच्छाशक्ति और विमर्श का अभाव है। नेता विपक्ष की भूमिका भी सवालों के घेरे में है, जहाँ गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर मौन और असंगत वक्तव्यों को प्राथमिकता दी जा रही है।
स्थिति चिंताजनक ही नहीं, बल्कि विस्फोटक होती जा रही है। जातीय और वैचारिक विघटनकारी शक्तियाँ समाज में केवल नफरत के बीज बोने में लगी हैं। लोकतंत्र में तर्कसंगत विरोध और सार्थक समर्थन की परंपरा लगभग लुप्त होती दिख रही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान विघटनकारी तत्वों के मन में शेष रह गया है? क्या संसद की गरिमा अब केवल एक औपचारिक शब्द भर बनकर रह गई है?
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की—क्या देश की एकता और लोकतंत्र की मर्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सदन की अवमानना से कमतर हो गई है? क्या समाज में अलगाव को बढ़ावा देने वाले प्रावधानों की पुनर्समीक्षा अब भी टाली जा सकती है?गुलिस्ताँ अभी पूरी तरह उजड़ा नहीं है, लेकिन यदि हर शाख पर उल्लू बैठे रहे, तो अंजाम समझना कठिन नहीं होगा।
