व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ‘अक्षय पात्र’: किडनी वाले मैसेज और हमारी डिजिटल समझ
(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स) आज से करीब तीन दशक पहले एक बाबा अपने भक्तों को आशीर्वाद देते थे—“इतना मिले कि बांटते-बांटते भी खत्म न हो।” तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह बात आने वाले समय में सोशल मीडिया, खासकर WhatsApp की दुनिया पर इतनी सटीक बैठ जाएगी। आज हाल यह है कि हर सुबह मोबाइल स्क्रीन पर ‘ज्ञान’, ‘सूचना’ और ‘सेवा’ के नाम पर संदेशों की बाढ़ आ जाती है—एक ऐसा अक्षय पात्र, जो कभी खाली नहीं होता।
फॉरवर्ड का फर्जी परोपकार
हाल ही में फिर एक ‘किडनी डोनेशन’ वाला मैसेज वायरल हुआ—जिसमें कथित तौर पर एक डॉक्टर और उनके परिवार द्वारा अंगदान की भावुक कहानी सुनाई जाती है। दिल को छूने वाले इस संदेश के पीछे की सच्चाई अक्सर गायब होती है, लेकिन लोग बिना जांचे-परखे इसे आगे बढ़ाते रहते हैं। विडंबना यह है कि वास्तविक जीवन में जहां लोग छोटी-सी मदद करने से भी हिचकते हैं, वहीं डिजिटल दुनिया में ‘फॉरवर्ड’ करना ही सबसे बड़ा परोपकार बन गया है।
भावनाओं के सहारे फैलता भ्रम
ऐसे संदेशों की सबसे बड़ी ताकत है—भावनात्मक अपील। “हो सकता है किसी की मदद हो जाए” जैसी पंक्तियां लोगों को बिना सोचे-समझे मैसेज आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं। परिणामस्वरूप, एक झूठ हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। कई बार इन संदेशों में दिए गए नंबर बंद होते हैं या किसी अनजान व्यक्ति के होते हैं, जिसे खुद नहीं पता कि वह किस ‘डिजिटल कहानी’ का हिस्सा बन चुका है।
विज्ञान बनाम व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी
वास्तव में अंग प्रत्यारोपण एक जटिल और सख्त कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें मैचिंग, मेडिकल जांच और प्रोटोकॉल शामिल होते हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर इसे इतना सरल बना दिया जाता है जैसे कोई सामान खरीदना हो। यह अंतर दिखाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलाई गई जानकारी और वास्तविकता के बीच कितना बड़ा फासला है।
‘इन्फो-डायरिया’ की समस्या
आज का सबसे बड़ा संकट सूचना की कमी नहीं, बल्कि उसकी अधिकता है। बिना पचाए, बिना समझे, सिर्फ आगे बढ़ा देना—यह प्रवृत्ति एक तरह की ‘इन्फो-डायरिया’ बन चुकी है। लोग सोचते हैं कि अगर खबर झूठी भी हुई तो उनका क्या नुकसान? जबकि सच यह है कि इससे उनकी विश्वसनीयता, समझदारी और समाज में सही जानकारी का प्रवाह—तीनों प्रभावित होते हैं।
डिजिटल साक्षरता की असली जरूरत
डिजिटल साक्षरता केवल ऐप चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी समझना है कि कौन-सी जानकारी सही है और कौन-सी नहीं। हर फॉरवर्ड मैसेज को सच मान लेना न सिर्फ गलत है, बल्कि इससे असली जरूरतमंद लोगों की आवाज भी दब जाती है।

