जब 'झाड़ू' को हुआ 'कॉकरोच' से प्यार, सोशल मीडिया पर छिड़ा नया सफाई अभियान
(लेखक: सुधाकर आशावादी | प्रस्तुति: विनायक फीचर्स)
किचन के इतिहास में एक अभूतपूर्व मोड़ आ गया है। 'झाड़ू' ने पूरी स्पष्टता के साथ यह ऐलान कर दिया है कि वह अब रसोई के किसी भी सफाई अभियान का हिस्सा नहीं बनेगी। विशेषकर तब, जब उसे कॉकरोच के खिलाफ किसी भी तरह की क्रूरता या दंडात्मक कार्रवाई करने का हुक्म दिया जाएगा। सरल शब्दों में कहें तो, अब झाड़ू ने कॉकरोच का हाथ थाम लिया है और वह उस पर आने वाले हर संकट में ढाल बनकर खड़ी रहेगी। यह कुछ वैसा ही है, जैसे सांप अचानक नेवले से गले मिलकर कहे—"भाई, आपसी रंजिश में क्या रखा है? आओ, अब मिलकर एक ही सुर में गाते हैं।"
संकट में दो नावों का मिलन
हमारे देश की फिजां में कब, किसके दिल में, किसके लिए प्रेम की गंगा बहने लगे, इसका अंदाजा बड़े-बड़े भविष्यवक्ता भी नहीं लगा सकते। सदियों से किचन के कोनों में अवैध घुसपैठ करने वाले कॉकरोच इस बात से गहरे डिप्रेशन में थे कि उनका वजूद खतरे में है। कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) के तीखे प्रहारों से बार-बार बेहोश होना और फिर बेदम होकर इसी झाड़ू के जरिए कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाना—आखिर कब तक कोई बर्दाश्त करता?
हताश होकर कॉकरोच ने झाड़ू के दरबार में अर्जी लगाई। उधर, झाड़ू खुद अपने गिरते वजूद और अकेलेपन से अवसाद में थी। आधुनिक वैक्यूम क्लीनर और अत्याधुनिक सफाई मशीनों ने उसकी जगह जो छीन ली थी। ऐसे में कॉकरोच की इस पुकार ने झाड़ू की डूबती हुई साख में संजीवनी फूंकने का काम किया।
डिजिटल सड़कों पर 'कॉकरोच' बनने की होड़
सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में रातों-रात 'झाड़ू संगठन' एक्टिव हो गया। विडंबना देखिए, जिस झाड़ू का मूल कर्तव्य ही कॉकरोच का सफाया करना था, वह अब खुद को कॉकरोच साबित करने की प्रतियोगिता में शामिल हो गई है। डिजिटल दुनिया का हर दूसरा बाशिंदा आज खुद को गर्व से 'कॉकरोच' घोषित कर रहा है। फेसबुक की गलियों और इंस्टाग्राम के चौराहों पर 'कॉकरोचवाद' के नारे गूंज रहे हैं। स्वच्छता के बड़े-बड़े पैरोकार अब इस नए गठबंधन के मुरीद हो चुके हैं। यह भारतीय राजनीति और समाज का वह अद्भुत नजारा है, जहां झाड़ू और कॉकरोच मिलकर फाग गा रहे हैं और बैकग्राउंड में गाना चल रहा है—"दुश्मन-दुश्मन, जो दोस्तों से भी प्यारा है!"
अवसरवाद की नई परिभाषा: जब रंगे सियार हुए एक
भले ही अतीत में इनके रिश्तों में कितनी ही कड़वाहट रही हो, लेकिन आज के दौर के चतुर राजनेताओं की तरह, रिश्तों पर चाशनी की परत चढ़ाना इन्हें भी बखूबी आ गया है। वैसे भी, समकालीन समय में न तो कोई स्थाई शत्रु होता है और न ही मित्र।
कल तक जो एक-दूसरे को पानी पी-पीकर कोस रहे थे, एक-दूसरे के राजनीतिक वजूद को मिटाने पर तुले थे, वे आज बंद कमरों में चाय की चुस्कियां लेते हुए मुस्कुरा रहे हैं। वे कह रहे हैं—"छोड़ो यार, जो कल तुमने कहा या मैंने कहा, वो तो बस जुमला था। आओ, गले मिलें और मिलकर 'रंगे सियार' बन जाएं।"
आंदोलन से सत्ता सुख का सपना
आज का परिदृश्य यही है। जिस झाड़ू को कभी कॉकरोच देखना तक गंवारा नहीं था, आज वही झाड़ू उसे संरक्षण (Z+ सिक्योरिटी) देकर खुद को धन्य मान रही है। कॉकरोच भी बेहद गद्गद हैं। वे सोच रहे हैं कि अगर यह गठबंधन मजबूत रहा, तो वे भी एक बड़ा जनांदोलन खड़ा करके सीधे 'सत्ता के गलियारों' तक का सफर तय कर सकते हैं। जब व्यवस्था में झाड़ू और कॉकरोच की जुगलबंदी इतनी गहरी हो जाए, तो समझ लीजिए कि आने वाले समय में इनका यह मिला-जुला नाटक और भी ज्यादा असरदार और मनोरंजक होने वाला है।

