जब सत्ता की 'भिनभिनाहट' में उलझा मच्छरों का लोकतंत्र
लेखक: मुकेश "कबीर" (विनायक फीचर्स)
जैसे ही देश के राजनीतिक गलियारे में 'कॉकरोच पार्टी' के गठन की खबर आई, मच्छरों के कुनबे में भी सत्ता का स्वाद चखने की हलचल तेज हो गई। कुछ पढ़ा-लिखा और जोश से भरा युवा तबका तुरंत सक्रिय हुआ। तय किया गया कि अब हम भी अपनी किस्मत आज़माएंगे और 'राष्ट्रीय मच्छर कांग्रेस' बनाकर सीधे संसद का रुख करेंगे।
जीडीपी में हमारा योगदान सबसे ज्यादा, फिर हमें ही क्यों मारा जाता है?
पार्टी गठन के शुरुआती दौर में एक युवा मच्छर ने अपनी आबादी का हवाला देते हुए कहा— "आजकल चारों तरफ 'जितनी आबादी, उतना हक' का शोर है। हमारी तादाद सबसे ज्यादा है, फिर भी पंचायत से लेकर संसद तक हमारा एक भी नेता नहीं है। यही वजह है कि जब देखो, तब नगर निगम और ब्यूरोक्रेसी मशीनें लेकर हमारे पीछे पड़ जाते हैं। मानो देश में मच्छर मारने के अलावा कोई और काम ही न बचा हो!"
तभी एक दूसरा पढ़ा-लिखा मच्छर अपनी बात रखने के लिए हवा में उड़ा— "हम कोई आतंकवादी तो हैं नहीं! फिर भी जहाँ बैठते हैं, लोग वहीं ताली बजाकर हमारा काम तमाम कर देते हैं। इस देश की इकोनॉमी और जीडीपी तो हमारी ही बदौलत चल रही है। अगर हम न हों, तो आधी से ज्यादा मेडिकल इंडस्ट्री, डॉक्टर्स और बड़े-बड़े अस्पताल खाली हो जाएं। ये जो खिड़कियों पर नेट लगाने वाले कारपेंटर और नेट बनाने वाली टेक्सटाइल फैक्ट्रियां चल रही हैं, इन्हें रोजगार हमीं तो दे रहे हैं।
इसी बीच इतिहास के एक जानकार मच्छर ने दावा ठोक दिया— "इतिहास गवाह है कि अंग्रेज किसी बापू या चाचू के डर से देश छोड़कर नहीं भागे थे। हमारी मातृशक्ति (मादा मच्छरों) ने जो मलेरिया फैलाया था, उससे जितने अंग्रेज अधिकारी ढेर हुए, उतने तो क्रांतिकारियों की गोलियों से भी नहीं मरे होंगे। असली आजादी तो हमने दिलाई, पर आज हमें ही बैठने की जगह नहीं मिलती!"
जब कक्का ने सिखाया राजनीति का 'ककहरा'
युवाओं का जोश देखकर एक अधेड़ मच्छर आगे आया, जिसकी कुल उम्र करीब चार घंटे थी और वह पिछली सरकार में जेल की हवा भी खा चुका था। उसने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए पूछा— "लड़कों, पार्टी बनाना तो ठीक है, लेकिन तुम्हारा 'मेनिफेस्टो' (घोषणापत्र) क्या होगा?"
एक सीधे-साधे ग्रामीण मच्छर ने पूछा— "कक्का, जे मेनिफेस्टो का होत है? कक्का ने समझाया कि यह वो सियासी मुद्दा होता है जिसे दिखाकर जनता से वोट बटोरे जाते हैं। युवाओं ने तुरंत अपना मेनिफेस्टो तैयार किया:
-
सभी मच्छरों को बैठने के लिए सुरक्षित स्थान मिलेगा।
-
युवाओं को रोजगार की गारंटी दी जाएगी।
-
गरीबी मिटेगी और देश में कानून का राज होगा।
घोषणापत्र देखते ही कक्का अपना सिर पीट लिया। तभी एक 'फॉरेन रिटर्न' आधुनिक जन-ज़ी (Gen-Z) मच्छर अपनी खास स्टाइल में भिनभिनाया— "अंकल! व्हाट्स द प्रॉब्लम विद दिस मेनिफेस्टो? यू आर एन आउटडेटेड लीडर। समय बदल चुका है!"
कक्का हँसे और बोले— "बेटा, राजनीति में जोश के साथ होश जरूरी है। तुम्हारा यह घोषणापत्र तो समाज को जोड़ने की बात कर रहा है। याद रखो, जोड़ने वाले मेनिफेस्टो से कभी चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए समाज को तोड़ना पड़ता है।"
कक्का का 'मास्टरस्ट्रोक' और समाज का बंटवारा
अनुभवी कक्का ने तुरंत कमान संभाली और समाज को बांटने की गोटियां बिछानी शुरू कीं। उन्होंने आदेश दिया:
-
"सबसे पहले घर के अंदर रहने वाले और बाहर घूरे (कचरे) पर बैठने वाले मच्छरों की अलग लिस्ट बनाओ।"
-
"मलेरिया वाले, डेंगू वाले, पॉश इलाके वाले और झुग्गी-झोपड़ी में झक मारने वाले मच्छरों को अलग-अलग करो।"
-
"जो बिना बात के सिर्फ भिनभिना सकते हैं, उन्हें पार्टी का प्रवक्ता बनाओ।"
-
"और सबसे जरूरी— मंदिर वाले और मस्जिद वाले मच्छरों की लिस्ट सबसे पहले तैयार करो।"
कक्का ने अपनी पुरानी राजनीतिक उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि अब उन्हें सत्ता का कोई लालच नहीं है (वे चुनाव जीत चुके हैं, मंत्री रह चुके हैं और जेल भी जा चुके हैं), लेकिन वे युवाओं को जिताने के लिए चुनावी बिसात जरूर बिछाएंगे।
कक्का ने घूरे वाले मच्छरों की मीटिंग ली और कहा— "ये पॉश कॉलोनी वाले तुम्हारा हक मार रहे हैं, तुम 70% आरक्षण की मांग करो।" फिर मादा मच्छरों से कहा— "मलेरिया फैलाने की असली ताकत कुदरत ने तुम्हें दी है, फिर इन निकम्मे नर मच्छरों की गुलामी क्यों?"
नतीजतन: देश फिर उलझ गया!
आखिर में, सबको आपस में लड़ाने के बाद कक्का ने महासम्मेलन को संबोधित किया। इस बार उनका सुर बदला हुआ था— "हम सब एक हैं! हमारी लड़ाई किसी अंदरूनी मच्छर से नहीं, बल्कि उस 'कॉकरोच पार्टी' से है जिसने आज तक हमारा शोषण किया। हमारी सरकार बनी, तो घूरे वाले मच्छरों को पॉश कॉलोनियों में फ्लैट मिलेंगे। मंदिर में घंटियां नहीं बजेंगी क्योंकि उससे हमारे भाइयों की मौत होती है, और मस्जिद वाले मच्छरों को विशेष सब्सिडी दी जाएगी।"भाषण इतना दमदार था कि जिन युवाओं ने पार्टी खड़ी की थी, वे हाशिए पर चले गए और पार्टी ने 'ना-ना' करते कक्का को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।
देश एक बार फिर कॉकरोच और मच्छर के चुनावी चक्रव्यूह में फंस गया। अब सत्ता की मलाई दोनों मिलकर बांटेंगे— कॉकरोच जनता के कपड़े कुतरेंगे और मच्छर उनका खून चूसेंगे। और देश? देश हमेशा की तरह इसी मिलजुल कर चलने वाली 'भिनभिनाहट' के सहारे आगे बढ़ता रहेगा।
