जब सत्ता की 'भिनभिनाहट' में उलझा मच्छरों का लोकतंत्र

When the mosquito democracy got entangled in the buzzing of power
 
आंकड़ों की जुबानी: क्या वाकई सिस्टम फेल हुआ? इस वर्ष 12वीं की परीक्षा में 17,68,962 छात्र शामिल हुए थे। परिणाम घोषित होने के बाद 22.85% छात्रों ने 11,31,960 स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं के लिए आवेदन किया।  अमूमन हर साल पुनर्मूल्यांकन (Revaluation) का यह आंकड़ा सिर्फ 2 से 3 प्रतिशत के बीच रहता था।  इस बार इसका बढ़कर करीब 23 फीसदी हो जाना यह साबित करता है कि परदे के पीछे कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ी हुई है।  कहाँ चूका ओएसएम (OSM) सिस्टम? इस पूरे संकट की जड़ तकनीक को बिना तैयारी के, आनन-फानन में लागू करने की हड़बड़ी है।  मूल्यांकन में देरी: कॉपियों को स्कैन करने की प्रक्रिया के कारण कॉपियां जांचने का काम एक महीना देरी से शुरू हुआ। समय कम होने के कारण परीक्षकों पर भारी दबाव आ गया।  टारगेट का दबाव: शुरुआत में पोर्टल धीमा चलने के कारण काम और पिछड़ गया। बाद में शिक्षकों को रोजाना 12 से 15 कॉपियां जांचने का अमानवीय टारगेट दिया गया।  धुंधली (Blur) कॉपियों का मूल्यांकन: नियम के मुताबिक, जो कॉपी धुंधली स्कैन हुई हो, उसे रिजेक्ट कर दोबारा स्कैन किया जाना था। लेकिन वक्त बचाने के लिए कई सेंटर्स पर धुंधली प्रतियों को ही जांच दिया गया। परीक्षकों ने या तो अंदाजे से नंबर दे दिए या सीधे शून्य (0) अंक चढ़ा दिए। दो दिन बचाने के चक्कर में छात्रों का पूरा साल दांव पर लगा दिया गया।  सुरक्षा कवच का खत्म होना: ओएसएम से पहले मैन्युअल तीन-स्तरीय क्रॉस-चेक व्यवस्था थी, जिसमें दो इवैल्यूएटर कॉपियां बदलकर जांचते थे और फिर हेड एग्जामिनर रैंडम चेक करते थे। नई व्यवस्था में इस मानवीय सुरक्षा कवच को हटाकर सब कुछ कंप्यूटर के भरोसे छोड़ दिया गया।  होनहार छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला: न्याय की जगह मिली प्रताड़ना इस डिजिटल लापरवाही का सबसे बड़ा शिकार बना उत्तर प्रदेश का होनहार छात्र वेदांत श्रीवास्तव। 12वीं के इस छात्र को जब फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) में उम्मीद से बेहद कम अंक मिले, तो उसने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया। कॉपी देखकर वह दंग रह गया— सीबीएसई के पोर्टल पर जो उत्तर पुस्तिका अपलोड की गई थी, वह उसकी थी ही नहीं!  वेदांत ने जब अपनी आवाज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' और इंस्टाग्राम पर उठाई, तो उसे न्याय मिलने से पहले समाज और मीडिया के एक धड़े की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। वेदांत के भाई सिद्धांत के अनुसार, कई लोगों ने उन्हें ट्रोल किया। यहाँ तक कि दूरदर्शन के एक न्यूज़ एंकर ने तो बिना सच जाने इस पीड़ित छात्र को टीवी पर 'पाकिस्तानी' और 'एंटी-नेशनल' तक कह दिया।  सीबीएसई ने मानी गलती: चौतरफा दबाव के बाद आखिरकार सीबीएसई को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी। बोर्ड ने वेदांत को ईमेल भेजकर उसकी सही उत्तर पुस्तिका जारी की और परिणाम सुधारने का आश्वासन दिया।  पर बड़ा सवाल अब भी बाकी है: वेदांत को तो न्याय मिल गया, लेकिन वह पहली गलत कॉपी किस मासूम छात्र की थी? क्या उसे उसका हक मिला? और उन लाखों बच्चों का क्या, जिन्होंने डर या आर्थिक तंगी के कारण कॉपियां नहीं मंगवाईं?  गरीब बच्चों के लिए बेहद क्रूर है यह व्यवस्था सीबीएसई के तहत सिर्फ अमीर या शहरी बच्चे ही परीक्षा नहीं देते। इसमें जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV), केंद्रीय विद्यालय और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के वे बच्चे भी बैठते हैं जिनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर या किसान हैं और जिनकी मासिक आय महज 4-5 हजार रुपये है।  जब बच्चों ने कॉपियों में गड़बड़ी पकड़ी और विरोध शुरू हुआ, तब जाकर बोर्ड ने प्रति विषय फीस 700 रुपये से घटाकर 100 रुपये की। लेकिन 5 विषयों के लिए 500 रुपये जुटाना भी एक गरीब परिवार के लिए बड़ी चुनौती है।  सुप्रीम कोर्ट का आदेश दरकिनार: देश की सर्वोच्च अदालत साफ कह चुकी है कि उत्तर पुस्तिका आरटीआई (RTI) के तहत 'सूचना' के दायरे में आती है और इसे महज 2 रुपये प्रति पेज की दर पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। ऐसे में सीबीएसई द्वारा वसूला जा रहा यह शुल्क न्याय पर लगाया गया जुर्माना नजर आता है। क्या देश में न्याय सिर्फ उनके लिए है जिनकी जेब में पैसे हैं?  समाधान: भरोसे की इमारत को कैसे बचाया जाए? सीबीएसई भले ही खुद को तकनीकी रूप से कितना भी आधुनिक बताए, लेकिन जब 4 लाख से ज्यादा बच्चे सिस्टम पर शक कर रहे हों, तो केवल कागजी सफाइयों से खोया हुआ विश्वास वापस नहीं लाया जा सकता। बोर्ड को तुरंत ये 4 सुधारात्मक कदम उठाने होंगे:  मुफ्त डिजिटल कॉपी का अधिकार: रिजल्ट घोषित होने के साथ ही देश के हर छात्र को डिजीलॉकर (DigiLocker) के जरिए उसकी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिका मुफ्त में मिलनी चाहिए। यह छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है।  डबल-चेक व्यवस्था की बहाली: तकनीक के साथ-साथ मानवीय विवेक का होना जरूरी है। ओएसएम के भीतर दो शिक्षकों द्वारा क्रॉस-चेक करने के नियम को दोबारा बहाल किया जाए ताकि बारकोड की मानवीय या तकनीकी गलतियों को रोका जा सके।  शिक्षकों पर से दबाव कम हो: एक दिन में 15 कॉपियां जांचने का दबाव बंद होना चाहिए, क्योंकि यह मूल्यांकन की गुणवत्ता की हत्या है।  कड़ी जवाबदेही तय हो: जिन लोगों ने धुंधली कॉपियां जांची या बच्चों के बारकोड बदले, उन पर केवल विभागीय नहीं बल्कि दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी छात्र के करियर से खिलवाड़ न हो।  निष्कर्ष तकनीक का उद्देश्य काम में तेजी और निष्पक्षता लाना होता है। लेकिन जब तकनीक मानवीय संवेदना और जवाबदेही को निगल जाए, तो वह विकास नहीं बल्कि विनाश का कारण बनती है। शिक्षा के इस मंदिर की पवित्रता और न्याय की घंटी हर बच्चे के लिए— चाहे वह दिल्ली का हो या दंतेवाड़ा का— एक समान बजनी चाहिए। वरना, डिजिटल होने की इस अंधी दौड़ में देश के लाखों 'वेदांतों' का भविष्य सिस्टम के मलबे के नीचे दफन हो जाएगा।

लेखक: मुकेश "कबीर" (विनायक फीचर्स)

जैसे ही देश के राजनीतिक गलियारे में 'कॉकरोच पार्टी' के गठन की खबर आई, मच्छरों के कुनबे में भी सत्ता का स्वाद चखने की हलचल तेज हो गई। कुछ पढ़ा-लिखा और जोश से भरा युवा तबका तुरंत सक्रिय हुआ। तय किया गया कि अब हम भी अपनी किस्मत आज़माएंगे और 'राष्ट्रीय मच्छर कांग्रेस' बनाकर सीधे संसद का रुख करेंगे।

जीडीपी में हमारा योगदान सबसे ज्यादा, फिर हमें ही क्यों मारा जाता है?

पार्टी गठन के शुरुआती दौर में एक युवा मच्छर ने अपनी आबादी का हवाला देते हुए कहा— "आजकल चारों तरफ 'जितनी आबादी, उतना हक' का शोर है। हमारी तादाद सबसे ज्यादा है, फिर भी पंचायत से लेकर संसद तक हमारा एक भी नेता नहीं है। यही वजह है कि जब देखो, तब नगर निगम और ब्यूरोक्रेसी मशीनें लेकर हमारे पीछे पड़ जाते हैं। मानो देश में मच्छर मारने के अलावा कोई और काम ही न बचा हो!"

तभी एक दूसरा पढ़ा-लिखा मच्छर अपनी बात रखने के लिए हवा में उड़ा— "हम कोई आतंकवादी तो हैं नहीं! फिर भी जहाँ बैठते हैं, लोग वहीं ताली बजाकर हमारा काम तमाम कर देते हैं। इस देश की इकोनॉमी और जीडीपी तो हमारी ही बदौलत चल रही है। अगर हम न हों, तो आधी से ज्यादा मेडिकल इंडस्ट्री, डॉक्टर्स और बड़े-बड़े अस्पताल खाली हो जाएं। ये जो खिड़कियों पर नेट लगाने वाले कारपेंटर और नेट बनाने वाली टेक्सटाइल फैक्ट्रियां चल रही हैं, इन्हें रोजगार हमीं तो दे रहे हैं।

इसी बीच इतिहास के एक जानकार मच्छर ने दावा ठोक दिया— "इतिहास गवाह है कि अंग्रेज किसी बापू या चाचू के डर से देश छोड़कर नहीं भागे थे। हमारी मातृशक्ति (मादा मच्छरों) ने जो मलेरिया फैलाया था, उससे जितने अंग्रेज अधिकारी ढेर हुए, उतने तो क्रांतिकारियों की गोलियों से भी नहीं मरे होंगे। असली आजादी तो हमने दिलाई, पर आज हमें ही बैठने की जगह नहीं मिलती!"

जब कक्का ने सिखाया राजनीति का 'ककहरा'

युवाओं का जोश देखकर एक अधेड़ मच्छर आगे आया, जिसकी कुल उम्र करीब चार घंटे थी और वह पिछली सरकार में जेल की हवा भी खा चुका था। उसने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए पूछा— "लड़कों, पार्टी बनाना तो ठीक है, लेकिन तुम्हारा 'मेनिफेस्टो' (घोषणापत्र) क्या होगा?"

एक सीधे-साधे ग्रामीण मच्छर ने पूछा— "कक्का, जे मेनिफेस्टो का होत है? कक्का ने समझाया कि यह वो सियासी मुद्दा होता है जिसे दिखाकर जनता से वोट बटोरे जाते हैं। युवाओं ने तुरंत अपना मेनिफेस्टो तैयार किया:

  1. सभी मच्छरों को बैठने के लिए सुरक्षित स्थान मिलेगा।

  2. युवाओं को रोजगार की गारंटी दी जाएगी।

  3. गरीबी मिटेगी और देश में कानून का राज होगा।

घोषणापत्र देखते ही कक्का अपना सिर पीट लिया। तभी एक 'फॉरेन रिटर्न' आधुनिक जन-ज़ी (Gen-Z) मच्छर अपनी खास स्टाइल में भिनभिनाया— "अंकल! व्हाट्स द प्रॉब्लम विद दिस मेनिफेस्टो? यू आर एन आउटडेटेड लीडर। समय बदल चुका है!"

कक्का हँसे और बोले— "बेटा, राजनीति में जोश के साथ होश जरूरी है। तुम्हारा यह घोषणापत्र तो समाज को जोड़ने की बात कर रहा है। याद रखो, जोड़ने वाले मेनिफेस्टो से कभी चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए समाज को तोड़ना पड़ता है।"

कक्का का 'मास्टरस्ट्रोक' और समाज का बंटवारा

अनुभवी कक्का ने तुरंत कमान संभाली और समाज को बांटने की गोटियां बिछानी शुरू कीं। उन्होंने आदेश दिया:

  • "सबसे पहले घर के अंदर रहने वाले और बाहर घूरे (कचरे) पर बैठने वाले मच्छरों की अलग लिस्ट बनाओ।"

  • "मलेरिया वाले, डेंगू वाले, पॉश इलाके वाले और झुग्गी-झोपड़ी में झक मारने वाले मच्छरों को अलग-अलग करो।"

  • "जो बिना बात के सिर्फ भिनभिना सकते हैं, उन्हें पार्टी का प्रवक्ता बनाओ।"

  • "और सबसे जरूरी— मंदिर वाले और मस्जिद वाले मच्छरों की लिस्ट सबसे पहले तैयार करो।"

कक्का ने अपनी पुरानी राजनीतिक उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि अब उन्हें सत्ता का कोई लालच नहीं है (वे चुनाव जीत चुके हैं, मंत्री रह चुके हैं और जेल भी जा चुके हैं), लेकिन वे युवाओं को जिताने के लिए चुनावी बिसात जरूर बिछाएंगे।

कक्का ने घूरे वाले मच्छरों की मीटिंग ली और कहा— "ये पॉश कॉलोनी वाले तुम्हारा हक मार रहे हैं, तुम 70% आरक्षण की मांग करो।" फिर मादा मच्छरों से कहा— "मलेरिया फैलाने की असली ताकत कुदरत ने तुम्हें दी है, फिर इन निकम्मे नर मच्छरों की गुलामी क्यों?"

नतीजतन: देश फिर उलझ गया!

आखिर में, सबको आपस में लड़ाने के बाद कक्का ने महासम्मेलन को संबोधित किया। इस बार उनका सुर बदला हुआ था— "हम सब एक हैं! हमारी लड़ाई किसी अंदरूनी मच्छर से नहीं, बल्कि उस 'कॉकरोच पार्टी' से है जिसने आज तक हमारा शोषण किया। हमारी सरकार बनी, तो घूरे वाले मच्छरों को पॉश कॉलोनियों में फ्लैट मिलेंगे। मंदिर में घंटियां नहीं बजेंगी क्योंकि उससे हमारे भाइयों की मौत होती है, और मस्जिद वाले मच्छरों को विशेष सब्सिडी दी जाएगी।"भाषण इतना दमदार था कि जिन युवाओं ने पार्टी खड़ी की थी, वे हाशिए पर चले गए और पार्टी ने 'ना-ना' करते कक्का को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।

देश एक बार फिर कॉकरोच और मच्छर के चुनावी चक्रव्यूह में फंस गया। अब सत्ता की मलाई दोनों मिलकर बांटेंगे— कॉकरोच जनता के कपड़े कुतरेंगे और मच्छर उनका खून चूसेंगे। और देश? देश हमेशा की तरह इसी मिलजुल कर चलने वाली 'भिनभिनाहट' के सहारे आगे बढ़ता रहेगा।

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