सावन में जब प्रजा का हाल जानने निकलते हैं राजाधिराज महाकाल
पवन वर्मा—विनायक फीचर्स)
आकाशे तारकं लिङ्गं, पाताले हाटकेश्वरम्।
मृत्युलोके महाकालं, लिङ्गत्रयं नमोऽस्तुते॥
सनातन परंपरा में मान्यता है कि आकाश में तारकेश्वर, पाताल में हाटकेश्वर और मृत्युलोक में महाकाल का वास है। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर धाम की महिमा इसलिए भी अद्वितीय मानी जाती है कि यहां भगवान शिव को उज्जयिनी के अधिपति और राजाधिराज के रूप में पूजा जाता है। समय बदला, राजसत्ताएं बदलीं और अनेक शासक आए-गए, लेकिन उज्जैन की धार्मिक मान्यता में राजा का स्थान सदैव महाकाल के पास ही रहा।
सावन का महीना आते ही उज्जैन की पहचान और भी गहरी हो जाती है। विशेषकर सावन के सोमवार को पूरा शहर शिवभक्ति में डूबा नजर आता है। क्षिप्रा के घाटों पर पूजा-अर्चना, मंदिरों में गूंजती घंटियां, कांवड़ियों के जत्थे, साधु-संतों की मौजूदगी और हर ओर सुनाई देता ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष वातावरण को आध्यात्मिक रंग से भर देता है।
बारिश से धुली उज्जैन की सड़कें, मिट्टी की सोंधी खुशबू और शिव नाम का निरंतर जाप ऐसा वातावरण बनाते हैं, मानो पूरी नगरी स्वयं भगवान महाकाल की भक्ति में लीन हो गई हो।
सावन और शिव आराधना का गहरा संबंध
भगवान शिव और सावन के संबंध को लेकर धार्मिक परंपराओं में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। समुद्र मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की। मान्यता है कि विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव को जल अर्पित किया। इसी परंपरा की स्मृति में सावन के महीने में शिवलिंग पर जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है।
महाकाल की स्थापना से जुड़ी धार्मिक कथा भी उज्जैन की आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार अवंती नगरी में दूषण नामक असुर के अत्याचार से लोग परेशान थे। भक्तों की पुकार पर भगवान शिव प्रकट हुए और अधर्म का अंत किया। भक्तों के आग्रह पर उन्होंने उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग रूप में निवास स्वीकार किया। इसी कारण उज्जैन को महाकाल की नगरी के रूप में विशेष पहचान मिली।
राजा महाकाल और उनकी प्रजा
उज्जैन में पीढ़ियों से एक भाव प्रचलित है—‘राजा महाकाल, बाकी सब उनकी प्रजा।’ इसी आस्था से महाकाल की सवारी की परंपरा जुड़ी हुई है।
मान्यता है कि जिस प्रकार कोई राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण करता है, उसी प्रकार राजाधिराज महाकाल सावन में अपने भक्तों के बीच पहुंचते हैं। इसलिए महाकाल की यह यात्रा केवल धार्मिक शोभायात्रा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए राजा और प्रजा के आत्मीय संबंध का प्रतीक है।
सावन के सोमवार को जब सवारी निकलने का समय नजदीक आता है तो उज्जैन की गलियां श्रद्धालुओं से भरने लगती हैं। दूर-दराज के गांवों और शहरों से लोग बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कोई लंबी यात्रा करके आता है तो कोई घंटों पहले सवारी मार्ग पर अपनी जगह बना लेता है।
बुजुर्ग श्रद्धालु छड़ी के सहारे खड़े रहते हैं, माता-पिता बच्चों को कंधों पर बैठाकर बाबा की राह देखते हैं और महिलाएं पूजा की थाली सजाकर पालकी के दर्शन का इंतजार करती हैं। किसी के हाथ में रुद्राक्ष की माला होती है तो किसी के मुख पर शिव स्तुति का जाप।
पालकी निकलते ही शिवमय हो उठती है उज्जयिनी
फिर वह क्षण आता है, जिसका इंतजार हजारों श्रद्धालु कर रहे होते हैं। चांदी की पालकी में राजाधिराज बाबा महाकाल के दर्शन होते ही पूरा वातावरण ‘जय श्री महाकाल’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंज उठता है।
कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो जाती हैं। हाथ स्वतः जुड़ जाते हैं और सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं। उस क्षण भीड़ का अहसास पीछे छूट जाता है और हर व्यक्ति की नजर अपने आराध्य पर टिक जाती है।
पालकी के साथ आगे बढ़ता श्रद्धा का विशाल कारवां भी अपने आप में अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। ध्वज, घुड़सवार दल, पारंपरिक वाद्ययंत्र, साधु-संत, अखाड़ों के प्रतिनिधि, वैदिक मंत्रोच्चार, भजन मंडलियां और हजारों शिवभक्त मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें पूरा शहर शिवमय दिखाई देता है।
सवारी मार्ग बन जाता है आस्था का केंद्र
महाकाल की सवारी जिस मार्ग से गुजरती है, वह कुछ समय के लिए तीर्थस्थल जैसा अनुभव कराता है। घरों की छतों से पुष्पवर्षा होती है। कहीं गुलाब की पंखुड़ियां उड़ती हैं तो कहीं गेंदे के फूलों से बाबा का स्वागत किया जाता है।
महिलाएं आरती की थाल सजाकर पालकी का स्वागत करती हैं। बच्चे हाथ जोड़कर बाबा के दर्शन करते हैं। दुकानदार अपने प्रतिष्ठानों के सामने दीप जलाते हैं और घरों के बाहर रंगोली सजाई जाती है।
जिन परिवारों के घर सवारी मार्ग पर पड़ते हैं, उनके लिए यह दिन किसी पर्व से कम नहीं होता। कई लोग वर्षों से एक ही स्थान पर खड़े होकर बाबा की सवारी देखने की परंपरा निभा रहे हैं। उनके लिए यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि जीवन का सौभाग्य है।
आस्था के साथ संस्कृति का भी उत्सव
महाकाल की सवारी उज्जैन की धार्मिक आस्था के साथ-साथ मालवा की सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत प्रदर्शन है। लोकवाद्य, पारंपरिक भजन, अखाड़ों की परंपरा, संतों की उपस्थिति, वैदिक मंत्रोच्चार और आम श्रद्धालुओं की भागीदारी मिलकर इस आयोजन को विशिष्ट बनाते हैं।
सावन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। महाकाल की सवारी उनके लिए भारतीय धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता को करीब से देखने का अवसर भी बनती है।
सवारी के दौरान जब हजारों कंठ एक साथ ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते हैं, तब धार्मिक आस्था का वह सामूहिक स्वर किसी भी शब्द से कहीं अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है।
दर्शन के बाद थकान भी लगती है छोटी
घंटों तक सवारी मार्ग पर खड़े रहने के बाद श्रद्धालु थक जरूर जाते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और प्रसन्नता साफ दिखाई देती है। बाबा महाकाल के दर्शन की एक झलक उनके लिए पूरी थकान मिटा देती है।
कई भक्तों का भाव होता है कि आज स्वयं राजा उनके बीच आए हैं। उनके द्वार तक राजाधिराज का पहुंचना ही उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य है। यही विश्वास उन्हें हर वर्ष सावन में उज्जैन आने के लिए प्रेरित करता है।
सावन समाप्त हो जाता है। बारिश का मौसम भी आगे बढ़ जाता है, लेकिन महाकाल की सवारी की स्मृतियां भक्तों के मन में लंबे समय तक बनी रहती हैं।
उज्जैन की पहचान महाकालेश्वर मंदिर से जरूर है, लेकिन इस नगरी की आत्मा उस समय सबसे अधिक दिखाई देती है, जब राजाधिराज अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर अपनी प्रजा के बीच पहुंचते हैं।
महाकाल की सवारी आस्था, परंपरा और लोकजीवन का ऐसा संगम है, जिसने सदियों से उज्जैन की धार्मिक पहचान को जीवंत बनाए रखा है। यही वह क्षण है जब भक्त और भगवान के बीच की दूरी मानो मिट जाती है और हजारों श्रद्धालुओं के कंठ से एक ही स्वर निकलता है—
‘जय श्री महाकाल!’
(विनायक फीचर्स)
