कौन सुनेगा, किसको सुनाए कबीर-सी खरी-खरी

Who will listen, and to whom can we tell the unvarnished truth, like Kabir did?
 
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(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)

कबीर जब तक थे, खरा-खरा बोलते थे। उन्होंने कागज़ और कलम का उपयोग किया या नहीं—यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन यह निर्विवाद है कि कबीर के दोहे धर्म, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से परे थे। उनकी वाणी किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं थी। कबीर साहित्य इसका सशक्त प्रमाण है।

कबीर आज भी अपने विचारों में जीवित हैं। दरअसल, यही किसी साहित्यकार की सबसे बड़ी विशेषता होती है—वह वर्षों, बल्कि सदियों तक अपने विचारों के माध्यम से जीवित रहता है। यही कारण है कि किसी कवि की रचना का अनुवाद करते समय यह नहीं लिखा जाता कि कवि कहता था, बल्कि लिखा जाता है कि कवि कहता है। यह वर्तमान काल में कवि के वैचारिक अस्तित्व के जीवित रहने का प्रमाण है।

 

बहरहाल, बात लेखन में निष्पक्षता और तटस्थता की है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त विचार न तो स्थायी होते हैं और न ही व्यापक जनस्वीकृति प्राप्त कर पाते हैं। यूँ तो कबीर होना आसान नहीं है। कबीर बनने के लिए “न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर” जैसी मानसिक अवस्था चाहिए—जहाँ कोई बुरा माने या भला, जो सत्य है, वही कहा जाए। ऐसे रचनाकार आज विरले ही दिखाई देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वार्थ की राजनीति की तरह अभिव्यक्ति भी संकीर्ण दायरों के इर्द-गिर्द ही घूमने लगी है।

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साहित्य हो या समसामयिक चिंतन से जुड़े आलेख—उन्हें पढ़कर यह आभास तक नहीं होता कि कबीर आज भी जीवित हैं। खेमेबंदी अब वैचारिक गुलामी और बंधुआपन की प्रतीक बन चुकी है। कहीं केवल सत्ता को गाली देना ही लेखन का उद्देश्य रह गया है, तो कहीं किसी विशेष विचारधारा का गुणगान इस तरह किया जा रहा है, मानो वही एकमात्र श्रेष्ठ विचार हो। विचारों में तर्कशीलता का अकाल पड़ गया है। तर्क आधारित विमर्श को स्वीकार करने की मानसिकता ही समाप्त होती जा रही है। साहित्य के कथित अलंबरदार अब सृजन से अधिक सरकारी पुरस्कारों के जुगाड़ में लगे दिखाई देते हैं।

 

एक समय था जब साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता था। समाचार पत्रों में प्रकाशित सामग्री पर गंभीर बहस होती थी और उन बहसों से कोई स्पष्ट निष्कर्ष पाठकों के सामने आता था। उस दौर में संपादक न तो किसी लेखक के विचारों का अंध समर्थन करते थे और न ही उनका खुला विरोध। इसलिए वे एक स्पष्ट घोषणा के साथ तटस्थ रहते थे—कि प्रकाशित विचारों से सहमत होना संपादक के लिए अनिवार्य नहीं है। यह घोषणा आज भी अधिकांश समाचार पत्रों में छपी होती है।

 

लेकिन आज का दौर अपने-अपने सच और अपने-अपने पूर्वाग्रह के साथ जीने का युग बन गया है। हर कोई अपने विमर्श को सर्वोपरि सिद्ध करने पर आमादा है। समाज में अपने-अपने विचारधारात्मक एजेंडे के विस्तार के लिए अनेक संगठन सक्रिय हैं। ऐसे माहौल में कबीर-सी खरी-खरी बात आखिर कौन सुनाए—और उसे सुनने को तैयार कौन हो?
(विनायक फीचर्स)

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