सपना किसी का भी हो, लोकतंत्र जागता रहना चाहिए

Whosever dream it may be, democracy must remain awake.
 
सपना किसी का भी हो, लोकतंत्र जागता रहना चाहिए

(सुधाकर आशावादी—विनायक फीचर्स) सपने यदि खुली आंखों से देखे जाएं तो उन्हें सपने नहीं, बल्कि बुनी गई कल्पनाएं कहा जाएगा। सपने तो वे होते हैं जो वास्तविक प्रतीत तो होते हैं, किंतु जिनका यथार्थ से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। फिर भी सपनों को हकीकत से जोड़ने वाले लोग सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि सपनों को भी सत्य मानकर उनके अनुरूप आचरण किया जाना चाहिए। उस सपने में कितनी सच्चाई थी, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन आज भी सपनों और हकीकत के बीच का यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं बदला है।

अब तो सपनों की सच्चाई भी संदेह के घेरे में है। समझना मुश्किल है कि वास्तव में कौन-सा सपना देखा गया और किसे सपना बताकर उसे पूरा करने की कोशिश की गई। बहरहाल, हमारे एक मित्र हैं। उनके असंख्य नाम हैं और उनका आचरण ही कुछ ऐसा है कि लोग उनकी असलियत को आसानी से समझ नहीं पाते। उनके कुछ खास मित्र तो उनकी विशेषताओं का बखान करते हुए पूरा फिल्मी गीत सुनाने लगते हैं—कभी तू छलिया लगता है, कभी दीवाना लगता है, कभी अनाड़ी लगता है, कभी आवारा लगता है।

कई बार तो लगता है कि यह गीत भी मित्र महोदय की खूबियों का पूरा बखान नहीं कर पाता। इसमें उनकी विशेषताओं के अनुरूप कई और पंक्तियां जोड़ी जा सकती थीं। आखिर हर गीत अपने रचनाकार की कल्पनाओं पर आधारित होता है। रचनाकार कल्पना करता है और फिर गीत का सृजन होता है।

हमारे मित्र तो इन सबसे भी आगे हैं। वे इतने कल्पनाशील हैं कि उनके सपने ही उन्हें दूसरों से अलग साबित करते हैं। कभी उनकी दादी सपने में आती हैं और कहती हैं—“बेटे, तेरा जन्म ही राजसिंहासन पर बैठने के लिए हुआ है। तुम्हें तो चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए था, मगर तुम अब तक भटक रहे हो।”

बस, यही सपना मित्र महोदय को विचलित कर देता है। वे अपने खास अनुयायियों को दरबार में बुलाते हैं और उन्हें बताते हैं कि दादी ने सपने में क्या कहा है। अब सपना देखा गया है तो उसे पूरा करने की जिम्मेदारी भी किसी की तो बनती है। चाहे जो मजबूरी हो, दादी की सपने में कही गई मनोकामना पूरी होनी ही चाहिए।

अनुयायी वैसे तो किसी सपने पर आसानी से विश्वास नहीं करते, लेकिन अपने आराध्य की बात को नकार कर टाल भी नहीं सकते। सो, बैठक बुलाई जाती है। बैठक में विश्वासपात्रों को आमंत्रित किया जाता है और फिर इस बात पर विचार शुरू होता है कि मित्र महोदय को राजसिंहासन पर किस प्रकार बैठाया जाए, ताकि दादी का सपना पूरा हो सके।

कोई सुझाव देता है कि मित्र महोदय के राजतिलक में जो बाधाएं आ रही हैं, पहले उन्हें दूर किया जाए। किसी का विचार है कि बाधाओं के खिलाफ आंदोलन चलाया जाए। कोई इससे भी आगे बढ़कर कहता है कि बिना किसी न्यायिक निर्णय के विघ्न पैदा करने वालों को अपराधी घोषित कर दिया जाए। उनके खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की जाए। पैसे की भी कोई चिंता न की जाए। आखिर दादी का सपना पूरा करना है—भले ही वह सपना ही क्यों न हो!

सवाल सिर्फ इतना है कि सपना देखने वाले का सपना पूरा करना जरूरी है या फिर उस सपने को पूरा करने की कोशिश में जागती आंखों से देखी जा रही वास्तविकता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। क्योंकि सपने चाहे कितने ही आकर्षक क्यों न हों, लोकतंत्र और समाज की वास्तविकता किसी के सपने से नहीं, बल्कि जागती आंखों से तय होती है।

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