क्यों समय से पहले बूढ़ा हो जाता है आपका स्मार्टफोन? समझिए कंपनियों की रणनीति और इसका असर
डॉ. शैलेश शुक्ला — विनायक फीचर्स)
आज से एक दशक पहले मोबाइल फोन का मुख्य काम कॉल करना और संदेश भेजना था। लेकिन अब स्मार्टफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। अलार्म से लेकर बैंकिंग, ऑनलाइन पढ़ाई, कारोबार, दस्तावेज, मनोरंजन और परिवार की तस्वीरों तक बहुत कुछ इसी छोटे से उपकरण में मौजूद रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर स्मार्टफोन की उपयोगी उम्र कितनी है और वह कब तक हमारे काम का बना रहेगा?
अक्सर देखने को मिलता है कि फोन शारीरिक रूप से पूरी तरह ठीक होने के बावजूद कुछ वर्षों बाद उसमें नई समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। सॉफ्टवेयर अपडेट बंद हो जाते हैं, सुरक्षा पैच मिलने बंद हो जाते हैं, बैटरी पहले की तुलना में तेजी से खत्म होने लगती है और कुछ नए ऐप या फीचर पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में उपभोक्ता के सामने नया फोन खरीदने का विकल्प रह जाता है।
इसी प्रवृत्ति को तकनीकी और उपभोक्ता अधिकारों की चर्चा में 'प्लांड ऑब्सोलेसेंस' यानी नियोजित अप्रचलन कहा जाता है। हालांकि हर पुराने फोन का अनुपयोगी होना किसी कंपनी की सोची-समझी साजिश हो, ऐसा मानना सही नहीं होगा। तकनीकी सीमाएं, सुरक्षा आवश्यकताएं, हार्डवेयर क्षमता और सॉफ्टवेयर सपोर्ट की लागत भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सॉफ्टवेयर सपोर्ट से तय होती है फोन की उम्र
स्मार्टफोन की उपयोगी उम्र निर्धारित करने में सॉफ्टवेयर अपडेट की बड़ी भूमिका होती है। ऑपरेटिंग सिस्टम के बड़े अपडेट से नए फीचर और तकनीकी सुधार मिलते हैं, जबकि सुरक्षा अपडेट फोन को नए साइबर खतरों और कमजोरियों से बचाने में मदद करते हैं।
जब किसी पुराने मॉडल के लिए अपडेट बंद हो जाते हैं, तो फोन तत्काल खराब नहीं होता। वह पहले की तरह कॉल, कैमरा और कई दूसरे काम करता रह सकता है। लेकिन समय के साथ नए ऐप्स की आवश्यकताएं बढ़ती हैं और सुरक्षा जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
कंपनियों के लिए पुराने मॉडलों को लगातार अपडेट देना भी आसान काम नहीं है। अलग-अलग हार्डवेयर, प्रोसेसर, कैमरा, नेटवर्क और ऑपरेटिंग सिस्टम कॉन्फिगरेशन के कारण हर मॉडल की टेस्टिंग और मेंटेनेंस पर खर्च होता है। इसी वजह से कंपनियां एक निश्चित अवधि के बाद पुराने मॉडलों का सॉफ्टवेयर सपोर्ट समाप्त कर देती हैं।
प्रोसेसर और हार्डवेयर भी बड़ी वजह
फोन की उम्र केवल मोबाइल कंपनी के फैसले से तय नहीं होती। स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाले प्रोसेसर और दूसरे हार्डवेयर घटकों का सपोर्ट भी महत्वपूर्ण होता है।
क्वालकॉम और मीडियाटेक जैसी कंपनियां मोबाइल प्रोसेसर उपलब्ध कराती हैं। किसी चिपसेट के लिए ड्राइवर और तकनीकी सपोर्ट सीमित अवधि तक उपलब्ध होने पर फोन निर्माता के लिए लंबे समय तक नए ऑपरेटिंग सिस्टम को पुराने हार्डवेयर पर सपोर्ट करना मुश्किल हो सकता है।
हालांकि, तकनीक के क्षेत्र में यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। नए प्रोसेसर और बेहतर सॉफ्टवेयर सपोर्ट के साथ कई कंपनियां अब पहले की तुलना में कहीं अधिक वर्षों तक अपडेट उपलब्ध करा रही हैं।
बैटरी की क्षमता घटती है, फोन नहीं
स्मार्टफोन के पुराने होने की सबसे आम वजहों में बैटरी का कमजोर होना भी शामिल है। लिथियम-आयन बैटरियां इस्तेमाल और चार्जिंग चक्रों के साथ धीरे-धीरे अपनी क्षमता खोती हैं। दो-तीन साल के इस्तेमाल के बाद कई लोगों को बैटरी पहले की तुलना में जल्दी खत्म होती महसूस होती है।
ऐसे में जरूरी नहीं कि पूरा फोन बदल दिया जाए। यदि फोन बाकी मामलों में ठीक है और उपयुक्त बैटरी उपलब्ध है, तो बैटरी बदलकर उसकी उपयोगी उम्र काफी बढ़ाई जा सकती है। समस्या तब आती है जब बैटरी बदलना कठिन हो, स्पेयर पार्ट उपलब्ध न हो या मरम्मत की लागत उपभोक्ता को नया फोन खरीदने के लिए प्रेरित करे।
विज्ञापन भी पैदा करता है 'फोन पुराना होने' का एहसास
तकनीकी बदलाव के साथ बाजार की रणनीति भी उपभोक्ता के फैसले को प्रभावित करती है। हर कुछ महीनों में नए मॉडल, बेहतर कैमरा, तेज प्रोसेसर, ज्यादा रैम और नए एआई फीचर लॉन्च होते हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि पूरी तरह काम कर रहा पुराना फोन भी उपभोक्ता को तकनीकी रूप से पिछड़ा हुआ महसूस होने लगता है। जबकि रोजमर्रा के कॉल, मैसेज, सोशल मीडिया, बैंकिंग और सामान्य फोटोग्राफी जैसे कामों के लिए कई पुराने स्मार्टफोन अभी भी पर्याप्त हो सकते हैं।
इसलिए नया फोन खरीदने का फैसला केवल विज्ञापन या नए फीचर देखकर नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत और पुराने फोन की स्थिति देखकर करना बेहतर है।
असर सिर्फ जेब पर नहीं, पर्यावरण पर भी
बार-बार स्मार्टफोन बदलने का असर व्यक्तिगत बजट के साथ पर्यावरण पर भी पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में कई ऐसे पदार्थ और धातुएं होती हैं जिन्हें सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल करना जरूरी है। यदि ई-कचरे का उचित निपटान नहीं किया जाए तो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
भारत जैसे बड़े स्मार्टफोन बाजार में फोन की औसत उपयोगी उम्र बढ़ाना ई-कचरे को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि उपभोक्ता केवल नया मॉडल आने के कारण फोन बदलने के बजाय पुराने उपकरण को अधिक समय तक इस्तेमाल करें, मरम्मत कराएं और सही तरीके से रिसाइकिल करें तो इसका सकारात्मक असर पड़ेगा।
यूरोप ने उपभोक्ता हित में बढ़ाया कदम
यूरोपीय संघ ने स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की टिकाऊपन और मरम्मत से जुड़े नियमों को मजबूत किया है। नए नियमों के तहत निर्माताओं पर लंबे समय तक सॉफ्टवेयर सपोर्ट और स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने जैसी जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं।
इन नियमों का उद्देश्य यही है कि उपभोक्ता को कम समय में नया उपकरण खरीदने के लिए मजबूर न होना पड़े और उत्पादों की उपयोगी उम्र बढ़े। लंबे समय तक सॉफ्टवेयर अपडेट और मरम्मत की सुविधा मिलने से उपभोक्ताओं का खर्च कम होने के साथ ई-कचरा भी घटाया जा सकता है।
इसी दिशा में कई प्रमुख स्मार्टफोन कंपनियां अब अपने कुछ मॉडलों के लिए पहले की तुलना में काफी लंबी अवधि तक सॉफ्टवेयर अपडेट देने का दावा कर रही हैं।
भारत में भी लंबी अपडेट अवधि की जरूरत
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफोन बाजारों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में उपभोक्ता मध्यम कीमत वाले स्मार्टफोन खरीदते हैं। ऐसे में फोन की लंबी उपयोगी उम्र सीधे उपभोक्ता हित से जुड़ी है।
भारत में भी कंपनियों के लिए न्यूनतम सॉफ्टवेयर और सुरक्षा अपडेट अवधि को स्पष्ट करने, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता बढ़ाने और बैटरी जैसी प्रमुख चीजों की मरम्मत को आसान बनाने पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
इसके साथ ही उपभोक्ताओं को फोन खरीदते समय केवल कैमरा, रैम या डिजाइन पर ध्यान देने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि निर्माता कितने वर्षों तक ऑपरेटिंग सिस्टम और सुरक्षा अपडेट उपलब्ध कराएगा तथा भविष्य में बैटरी और अन्य स्पेयर पार्ट्स कितने समय तक मिलेंगे।
स्मार्टफोन अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बैंकिंग, शिक्षा, कारोबार और व्यक्तिगत दस्तावेजों तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए उसकी सुरक्षा और टिकाऊपन दोनों महत्वपूर्ण हैं।
फोन की उम्र केवल नए मॉडल के बाजार में आने से खत्म नहीं होनी चाहिए। बेहतर तकनीक के साथ बेहतर सॉफ्टवेयर सपोर्ट, आसान मरम्मत और जिम्मेदार ई-कचरा प्रबंधन ही वह रास्ता है, जिससे उपभोक्ता का पैसा भी बचेगा, डिजिटल सुरक्षा भी मजबूत होगी और पर्यावरण पर दबाव भी कम होगा।
(डॉ. शैलेश शुक्ला — विनायक फीचर्स)
