नफरत फैलाने पर सजा क्यों नहीं?

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समाज में वैमनस्य फैलाने वालों पर कानून का शिकंजा क्यों नहीं?
 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है। संविधान नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वहीं सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, मानहानि और अन्य वैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंधों की भी व्यवस्था करता है। इसलिए सोशल मीडिया पर कही गई हर बात को स्वतः ‘फ्री स्पीच’ मान लेना उचित नहीं हो सकता।  आज सोशल मीडिया पर कभी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री सामने आती है, तो कभी जातीय अथवा सामुदायिक टिप्पणियां विवाद को जन्म देती हैं। कई बार राजनीतिक समर्थन और विरोध के बीच मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और कार्रवाई भी व्यक्ति या समूह की राजनीतिक पहचान के आधार पर देखी जाने लगती है। इससे कानून के प्रति आम लोगों का विश्वास प्रभावित होने की आशंका रहती है।  सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया पर देश के प्रधानमंत्री, किसी राजनीतिक दल, धर्म, जाति या समुदाय के विरुद्ध अपमानजनक और घृणा फैलाने वाली भाषा के इस्तेमाल की असीमित स्वतंत्रता दी जा सकती है? क्या धार्मिक आस्थाओं से जुड़े देवी-देवताओं या किसी समुदाय के प्रतीकों के बारे में आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति कहकर छोड़ दिया जाना चाहिए?  निश्चित रूप से किसी सरकार, नेता, धर्म या सामाजिक व्यवस्था की आलोचना और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन आलोचना और घृणा फैलाने के बीच अंतर करना भी उतना ही जरूरी है। असहमति को अपराध मान लेना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं होगा, लेकिन जानबूझकर हिंसा, वैमनस्य या सामाजिक तनाव को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर कानून के अनुसार कार्रवाई होना भी आवश्यक है।  यही कारण है कि कानून का इस्तेमाल किसी राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि समान मानदंडों के आधार पर होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति की आपत्तिजनक भाषा पर कार्रवाई होती है, तो समान परिस्थितियों में दूसरे व्यक्ति को भी केवल उसकी जाति, धर्म, राजनीतिक पहचान या सामाजिक प्रभाव के कारण संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।  देश में कानून पहले से मौजूद हैं और आपराधिक मामलों के लिए न्यायिक व्यवस्था भी है। सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था में आपराधिक कानून से जुड़े मामलों के लिए स्पष्ट श्रेणियां निर्धारित हैं। सवाल इसलिए केवल कानून की मौजूदगी का नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और समयबद्ध पालन का है।  एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सोशल मीडिया के दौर में नफरत फैलाने वाली सामग्री की पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है। किसी वायरल वीडियो या पोस्ट को देखकर तत्काल किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा देना भी उचित नहीं है। पहले तथ्य, संदर्भ, मंशा और कानूनी प्रावधानों की जांच होनी चाहिए और उसके बाद ही पुलिस अथवा न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।  लोकतंत्र में विरोध की आवाज दबाई नहीं जानी चाहिए और न ही आलोचना को अपराध का पर्याय बनाया जाना चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। समाज में हिंसा या वैमनस्य पैदा करने वाली भाषा को सामान्य बनाना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के हित में नहीं है।  इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून सभी के लिए समान है? यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया का इस्तेमाल जानबूझकर नफरत और सामाजिक विभाजन फैलाने के लिए करता है, तो उसकी पहचान, राजनीतिक विचारधारा, जाति, धर्म या लिंग से परे कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।  नफरत का जवाब किसी दूसरे पक्ष की नफरत नहीं, बल्कि निष्पक्ष कानून और संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और उसके नाम पर कानून तोड़ने वालों के लिए भी समान नियम लागू हों।  यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है—अभिव्यक्ति की आजादी भी रहे और सामाजिक सद्भाव भी। कानून का पैमाना व्यक्ति देखकर नहीं, कृत्य देखकर तय हो।

डॉ. सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स

विगत कुछ समय से सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बनने के साथ-साथ विवाद और ध्रुवीकरण का मंच भी बनता जा रहा है। सस्ती लोकप्रियता, अधिक व्यूज और फॉलोअर्स की होड़ में कुछ लोग ऐसी भाषा और सामग्री का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं, जो सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती है। राष्ट्र, धर्म, जाति अथवा किसी समुदाय के प्रति घृणा और वैमनस्य पैदा करने वाली अभिव्यक्ति को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर उचित ठहराया जाना गंभीर विचार का विषय है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है। संविधान नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वहीं सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, मानहानि और अन्य वैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंधों की भी व्यवस्था करता है। इसलिए सोशल मीडिया पर कही गई हर बात को स्वतः ‘फ्री स्पीच’ मान लेना उचित नहीं हो सकता।

आज सोशल मीडिया पर कभी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री सामने आती है, तो कभी जातीय अथवा सामुदायिक टिप्पणियां विवाद को जन्म देती हैं। कई बार राजनीतिक समर्थन और विरोध के बीच मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और कार्रवाई भी व्यक्ति या समूह की राजनीतिक पहचान के आधार पर देखी जाने लगती है। इससे कानून के प्रति आम लोगों का विश्वास प्रभावित होने की आशंका रहती है।

सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया पर देश के प्रधानमंत्री, किसी राजनीतिक दल, धर्म, जाति या समुदाय के विरुद्ध अपमानजनक और घृणा फैलाने वाली भाषा के इस्तेमाल की असीमित स्वतंत्रता दी जा सकती है? क्या धार्मिक आस्थाओं से जुड़े देवी-देवताओं या किसी समुदाय के प्रतीकों के बारे में आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति कहकर छोड़ दिया जाना चाहिए?

निश्चित रूप से किसी सरकार, नेता, धर्म या सामाजिक व्यवस्था की आलोचना और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन आलोचना और घृणा फैलाने के बीच अंतर करना भी उतना ही जरूरी है। असहमति को अपराध मान लेना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं होगा, लेकिन जानबूझकर हिंसा, वैमनस्य या सामाजिक तनाव को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर कानून के अनुसार कार्रवाई होना भी आवश्यक है।

यही कारण है कि कानून का इस्तेमाल किसी राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि समान मानदंडों के आधार पर होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति की आपत्तिजनक भाषा पर कार्रवाई होती है, तो समान परिस्थितियों में दूसरे व्यक्ति को भी केवल उसकी जाति, धर्म, राजनीतिक पहचान या सामाजिक प्रभाव के कारण संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

देश में कानून पहले से मौजूद हैं और आपराधिक मामलों के लिए न्यायिक व्यवस्था भी है। सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था में आपराधिक कानून से जुड़े मामलों के लिए स्पष्ट श्रेणियां निर्धारित हैं। सवाल इसलिए केवल कानून की मौजूदगी का नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और समयबद्ध पालन का है।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सोशल मीडिया के दौर में नफरत फैलाने वाली सामग्री की पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है। किसी वायरल वीडियो या पोस्ट को देखकर तत्काल किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा देना भी उचित नहीं है। पहले तथ्य, संदर्भ, मंशा और कानूनी प्रावधानों की जांच होनी चाहिए और उसके बाद ही पुलिस अथवा न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।

लोकतंत्र में विरोध की आवाज दबाई नहीं जानी चाहिए और न ही आलोचना को अपराध का पर्याय बनाया जाना चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। समाज में हिंसा या वैमनस्य पैदा करने वाली भाषा को सामान्य बनाना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के हित में नहीं है।

इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून सभी के लिए समान है? यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया का इस्तेमाल जानबूझकर नफरत और सामाजिक विभाजन फैलाने के लिए करता है, तो उसकी पहचान, राजनीतिक विचारधारा, जाति, धर्म या लिंग से परे कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

नफरत का जवाब किसी दूसरे पक्ष की नफरत नहीं, बल्कि निष्पक्ष कानून और संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और उसके नाम पर कानून तोड़ने वालों के लिए भी समान नियम लागू हों।

यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है—अभिव्यक्ति की आजादी भी रहे और सामाजिक सद्भाव भी। कानून का पैमाना व्यक्ति देखकर नहीं, कृत्य देखकर तय हो।

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