शाकाहारी व्यंजन क्यों न परोसे जाएँ?

Why shouldn't vegetarian dishes be served?
 
शाकाहारी व्यंजन क्यों न परोसे जाएँ?

सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स

मेजबान अपने मेहमानों की आवभगत किस प्रकार करता है, यह पूरी तरह उसकी इच्छा, सोच और आतिथ्य की परंपरा पर निर्भर करता है। ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर में मेहमानों को क्या परोसा जाए, इसका निर्णय मेजबान ही करता है। घर में जन्मदिन से लेकर मैरिज एनिवर्सरी तक होने वाली पार्टियों में परोसे जाने वाले व्यंजनों का चयन भी परिवार के सदस्य अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार करते हैं। इसमें किसी बाहरी व्यक्ति का हस्तक्षेप सामान्यतः नहीं होता।

विशेष मेहमानों के लिए पारंपरिक और विशिष्ट व्यंजन परोसना भारतीय आतिथ्य परंपरा का हिस्सा रहा है। मेजबान की कोशिश रहती है कि मेहमान उसके यहां के भोजन के स्वाद को याद रखें। ऐसे में यदि किसी आयोजन में मेजबान अपनी पसंद के व्यंजन परोसता है, तो उस पर सवाल उठाना कितना उचित है?

हाल में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के डिनर में परोसे गए शाकाहारी भारतीय व्यंजनों को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए। उनका तर्क रहा कि मेहमानों को भारतीय पारंपरिक मांसाहारी व्यंजन भी परोसे जाने चाहिए थे। इसके विपरीत, मेजबान ने भारतीय खानपान की शाकाहारी परंपरा के अनुरूप विविध व्यंजनों का चयन किया।

tuiy

पारंपरिक भारतीय स्वादों से सजा डिनर

डिनर में सरसों, नारियल और करी पत्ते के तड़के वाले स्टीम्ड बेसन रोल से शुरुआत हुई। इसके बाद केसर, किशमिश और ममरा बादाम के साथ तैयार हिमालयन मोरेल मशरूम और कोमल शतावरी परोसी गई।

दक्षिण भारतीय मसालों और ताजे नारियल तेल में तैयार गाजर और बीन्स का कैरट-बीन्स पोरियाल भी मेन्यू का हिस्सा था। टमाटर और मसालों की ग्रेवी में तैयार पनीर लबाबदार के साथ बासमती चावल, पर्ल मिलेट और भारतीय मसालों से तैयार पुलाव तथा बीटरूट रायता परोसा गया। भोजन के अंत में पुरानी दिल्ली की मशहूर शैली से प्रेरित फ्रूट क्रीम के साथ जलेबी ने मिठास घोली।

मेजबान ने अपनी ओर से जो बेहतर समझा, वही मेहमानों के सामने परोसा। भारतीय आतिथ्य परंपरा में भी मेजबान आम तौर पर उन्हीं व्यंजनों को प्राथमिकता देता है, जिनकी गुणवत्ता और स्वाद को लेकर वह आश्वस्त होता है। मेहमानों से पहले मेन्यू की पसंद पूछना हर दावत का अनिवार्य हिस्सा नहीं होता।

मेहमाननवाजी में पसंद का सम्मान

आतिथ्य का मूल भाव ही यह है कि मेजबान अपने मेहमान का सम्मान करे और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसके सामने भोजन प्रस्तुत करे। किसी व्यंजन का स्वाद कैसा है, यह अक्सर उसे चखने के बाद ही जाना जा सकता है। इसलिए किसी नए व्यंजन को केवल इस आधार पर नकार देना कि वह पहले नहीं खाया गया, भारतीय खानपान की विविधता के साथ न्याय नहीं करता।

ब्रिक्स सम्मेलन के डिनर में शाकाहारी व्यंजन परोसे गए और मेहमानों ने उनका स्वाद लिया। भोजन के बाद उसकी कमियां गिनाना या मेजबान की पसंद पर सवाल उठाना सामान्य आतिथ्य शिष्टाचार की दृष्टि से भी उचित नहीं माना जाता। खासकर तब, जब मेजबान ने भारतीय व्यंजनों की विविधता को सामने रखने का प्रयास किया हो।

भोजन पर सियासत क्यों?

भारतीय भोजन परंपरा बेहद विविध है। यहां शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों तरह के खानपान की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। किसी विशेष आयोजन में मेजबान द्वारा एक खास भोजन-पद्धति का चयन करना अपने आप में असामान्य बात नहीं है।

फिर सवाल यह है कि किसी की दावत में परोसे गए पारंपरिक व्यंजनों पर अनावश्यक बहस क्यों हो? मेजबान ने शाकाहारी भोजन चुना, विविध भारतीय स्वादों को मेन्यू में शामिल किया और मेहमानों के सामने उसे सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया। ऐसे में चर्चा इस बात पर हो सकती है कि भारतीय व्यंजनों की विविधता किस तरह दुनिया के सामने पहुंच रही है, न कि इस पर कि शाकाहारी भोजन क्यों परोसा गया।

आखिरकार, दावत का उद्देश्य मेहमानों का सम्मान और सत्कार करना होता है। मेजबान की पसंद का सम्मान करना भी उसी आतिथ्य परंपरा का हिस्सा है। जलेबी जैसे पारंपरिक भारतीय स्वाद की मिठास यदि मेहमानों को याद रह जाए, तो यही किसी भी मेजबानी की सार्थकता मानी जा सकती है।

Tags