काजल का साथ और कालिख से परहेज़: निष्कपट सेवा पर षड्यंत्र का ग्रहण
सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स)
एक पुराना फिल्मी गीत कहता है—“अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है।” ये पंक्तियाँ जीवन के कई मोड़ों पर अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करती हैं। जब किसी सीधे और सज्जन पुरुष को बदनाम करने के लिए दुर्जन लोग षड्यंत्रों का ताना-बाना बुनते हैं और उसे दोषी ठहराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं, तब बरबस ही ये बातें याद आ जाती हैं।
परंतु, इस कड़वी सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि 'कोयले की दलाली में हाथ तो काले होते ही हैं।' अब कोई प्रत्यक्ष रूप से दलाली करे या न करे, यदि वह कोयले के गोदाम की केवल चौकीदारी भी कर रहा है, तो कालिख का कुछ हिस्सा उसके हिस्से भी आएगा। वह चाहे कितना भी स्पष्टीकरण दे कि उसका गल्ले या गोदाम के मुनाफे से कोई संबंध नहीं है, लेकिन जिन्हें उस दलाली में हिस्सा नहीं मिलता, वे उसे कटघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आते।
नौकरी और गृहस्थी का त्याग: समाज सेवा की अलख
लेखक अपने एक परम मित्र का उदाहरण देते हुए समाज की विडंबना को उजागर करते हैं। वे मित्र एक अनूठे व्यक्तित्व के धनी हैं:
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सादगी का प्रतीक: वे बिना जेब का कुर्ता पहनते हैं और उनके पाजामे में भी कोई जेब नहीं होती—यानी संचय की कोई प्रवृत्ति नहीं।
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मानवता को समर्पित: बरसों से कई चैरिटेबल ट्रस्ट संचालित कर रहे हैं, निराश्रितों को आश्रय देते हैं और मानसिक रूप से विक्षिप्त व बेसहारा लोगों का मुफ्त उपचार कराते हैं।
जिस आधुनिक दौर में अमूमन हर व्यक्ति परिवार के मोहजाल में फंसा रहता है और अपनी 'घरवाली' के इशारों पर नाचने को विवश रहता है, उस दौर में वे महाशय अपनी अच्छी-खासी सरकारी नौकरी और घर-बार छोड़कर निस्वार्थ सेवा के क्षेत्र में उतर आए। उनकी सबसे बड़ी खूबी—और शायद सबसे बड़ी कमजोरी—यह थी कि वे हर व्यक्ति को अपना मानकर उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते थे। इसी सहज विश्वास के कारण उन्होंने अपने ट्रस्ट की पूरी व्यवस्था एक कर्मचारी को सौंप दी।
आस्तीन का सांप और जॉन डीवी की प्रयोगधर्मिता
वे मित्र प्रसिद्ध दार्शनिक जॉन डीवी की तरह प्रयोगधर्मी (Pragmatist) दृष्टिकोण रखते थे। वे पुरातन सत्यों को तब तक स्वीकार नहीं करते थे, जब तक कि उन्हें परीक्षण की कसौटी पर कस न लिया जाए। शायद अपने उस खास कर्मचारी के प्रति भी उन्होंने यही रुख अपनाया।
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अंधविश्वास का परिणाम: उन्होंने समाज सेवा के लिए आने वाले दान और ट्रस्ट के गोदाम की चाबियां उस व्यक्ति को सौंप दीं।
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भरोसे का कत्ल: उन्हें इस बात का भान नहीं था कि जिसे वे अपना परम विश्वासपात्र मान रहे हैं, वह आस्तीन का सांप निकलेगा।
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तपस्या पर ग्रहण: उस कर्मचारी ने दान-पेटियों से धन की चोरी शुरू कर दी, ट्रस्ट की संपत्ति से अपनी निजी तिजोरियां भरीं और देखते ही देखते ट्रस्ट के भीतर एक भ्रष्ट तंत्र खड़ा कर दिया, जो संस्था की बुनियाद को ही डसने लगा।
विधि का विधान और काजल की कोठरी
जब यह चोरी उजागर हुई, तो सारा जीवन ईश्वर और मानवता की भक्ति में लगाने वाले वे निर्दोष मित्र भी संदेह के घेरे में आ गए। उनकी साख और निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लग गया।
इससे पहले कि वे दुनिया के सामने अपनी बेगुनाही के स्पष्टीकरण देते या खुद को सच्चा साबित करने की कानूनी जंग लड़ते, उन्हें विधाता का न्याय और तुलसीदास जी की अमर चौपाई स्मरण हो आई:
"हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।"
उन्होंने किसी से कोई शिकायत नहीं की, चुपचाप अपना झोला उठाया और एक नए मार्ग पर निकल पड़े। जाते-जाते उन्हें लोक-जीवन की वह पुरानी कहावत गहराई से समझ आ गई कि काजल की कोठरी में आप चाहे कितने भी सयाने बनकर रहें, कालिख का एक दाग तो भुगतना ही पड़ता है।
