योगी सरकार के प्रयासों से ‘रेफरल से समाधान’ की ओर बढ़े छोटे जिलों के अस्पताल, जटिल प्रसव भी अब स्थानीय स्तर पर संभव
प्रशिक्षण से बढ़ी क्षमता, बदली तस्वीर
पिछले चार वर्षों में प्रदेश के 76 जिला अस्पतालों के 1,791 डॉक्टरों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। इस क्षमता वृद्धि का सीधा असर अस्पतालों की कार्यक्षमता पर पड़ा है, जहां अब जटिल से जटिल मामलों को भी स्थानीय स्तर पर संभाला जा रहा है।
आरआरटीसी मॉडल बना बदलाव की नींव
रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर (आरआरटीसी) मॉडल ने मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेज आरआरटीसी के रूप में कार्य कर रहे हैं, जो जिला अस्पतालों को “हब-एंड-स्पोक” मॉडल के जरिए मार्गदर्शन दे रहे हैं।
इस मॉडल के तहत ऑन-साइट मेंटरिंग, नर्सिंग स्टाफ का सशक्तीकरण और निरंतर प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
जमीनी स्तर पर दिख रहा बदलाव
कासगंज जिला महिला अस्पताल इसका एक प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है। वर्ष 2017 में जहां एक सफल सी-सेक्शन बड़ी उपलब्धि थी, वहीं आज यहां ऑपरेशन थिएटर पूरी तरह सक्रिय है और अधिकांश स्टाफ प्रशिक्षित है। अब कई जटिल प्रसव मामलों का इलाज यहीं संभव हो रहा है, जिससे समय की बचत के साथ माताओं और नवजातों की जान भी बचाई जा रही है।
कोविड-19 के दौरान भी जारी रहा प्रशिक्षण
COVID-19 के कठिन दौर में भी यह पहल नहीं रुकी। ऑनलाइन माध्यम से प्रशिक्षण जारी रखा गया और यह सुनिश्चित किया गया कि प्रसव और नवजात देखभाल सेवाएं प्रभावित न हों।
जीवनरक्षक साबित हो रही नई व्यवस्था
अलीगढ़ स्थित जेएन मेडिकल कॉलेज के आरआरटीसी में एक जटिल केस में हेटरोटॉपिक प्रेग्नेंसी (एक साथ गर्भाशय और ट्यूब में गर्भ) की पहचान कर समय रहते सर्जरी की गई, जिससे मरीज की जान बचाई जा सकी। बाद में उसी महिला ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
यह उदाहरण दर्शाता है कि अब जिला और मेडिकल कॉलेज स्तर पर स्वास्थ्य प्रणाली इतनी सक्षम हो रही है कि जीवन-जोखिम वाली स्थितियों को भी समय पर पहचानकर सफलतापूर्वक उपचार किया जा सके।
मजबूत हो रहा स्वास्थ्य तंत्र
इस पहल से न केवल मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करने में मदद मिल रही है, बल्कि प्रदेश का स्वास्थ्य तंत्र भी अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बन रहा है। छोटे जिलों के अस्पताल अब “रेफरल” नहीं बल्कि “समाधान” के केंद्र बनते जा रहे हैं।
