गाज़ा की महिलाएं: भूख और मजबूरी के बीच इंसानियत पर सवाल

Women of Gaza: Question on humanity between hunger and compulsion
 
गाज़ा की महिलाएं: भूख और मजबूरी के बीच इंसानियत पर सवाल

(मनोज कुमार अग्रवाल – विनायक फीचर्स)

गाज़ा पट्टी में जारी इज़राइल–हमास युद्ध ने न केवल घर उजाड़ दिए हैं, बल्कि यहां की महिलाओं की ज़िंदगी को भी अंधेरी खाई में धकेल दिया है। हालात इतने भयावह हो गए हैं कि कई महिलाओं को अपने बच्चों का पेट भरने के लिए समझौते करने पड़ रहे हैं। दो वक्त की रोटी और पानी के लिए उन्हें अपनों ही के बीच अपमान और शोषण सहना पड़ रहा है।

पिछले दो वर्षों से लगातार जारी युद्ध ने गाज़ा को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। यहां भोजन, पानी और पैसों की भारी किल्लत है। इसी संकट का फायदा कुछ स्थानीय पुरुष और सहायता से जुड़े लोग उठा रहे हैं। कई महिलाओं ने गुमनाम रहते हुए बताया है कि उन्हें मदद के नाम पर यौन संबंधों के लिए दबाव झेलना पड़ता है। कई बार तो शादी का झांसा देकर उन्हें बहकाने की कोशिश की जाती है।

यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी दक्षिण सूडान, बुर्किना फासो, कांगो, चाड और हैती जैसे देशों में मानवीय संकट के दौरान ऐसे शोषण की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब लोग विस्थापित होते हैं और मदद पर निर्भर हो जाते हैं, तो महिलाएं सबसे ज़्यादा असुरक्षित हो जाती हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच की वीमेन राइट्स डिविजन की एसोसिएट डायरेक्टर हीथर बर्र का कहना है, “मानवीय संकट लोगों को कई स्तरों पर कमजोर बना देता है और इसका सबसे बड़ा खामियाजा महिलाएं और लड़कियां भुगतती हैं। गाज़ा की मौजूदा स्थिति अकल्पनीय है।”

गाज़ा में काम करने वाले मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि उनके पास कई मामले आए, जहां महिलाओं को मदद के बदले शोषण झेलना पड़ा। कुछ ने मजबूरी में सहमति दी, तो कुछ ने इनकार किया। कई महिलाएं मानसिक आघात की शिकार हो गईं और कुछ गर्भवती तक हो गईं। रूढ़िवादी समाज में यह मुद्दा इतना संवेदनशील है कि महिलाएं खुलकर अपनी पीड़ा भी नहीं बयां कर पातीं।

महिलाओं ने बताया कि कई बार सहायता का वादा करने वाले लोग संयुक्त राष्ट्र या अन्य संगठनों से जुड़े होने का दावा करते थे। रजिस्ट्रेशन या सहायता वितरण के दौरान उनके नंबर लिए जाते और फिर देर रात तक अभद्र कॉल और मैसेज किए जाते। कुछ मामलों में स्थानीय नेता और समुदाय से जुड़े लोग भी इसमें शामिल पाए गए।

छह बच्चों की मां ने बताया कि एक व्यक्ति ने उसे नौकरी का वादा किया, जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतीकों वाली कार में आता था। शुरुआत में बातचीत सामान्य रही, लेकिन बाद में उसने आपत्तिजनक मैसेज और कॉल करने शुरू कर दिए। शिकायत करने पर भी उसे कहा गया कि सबूत पेश करो, जबकि उसके पास तकनीकी साधन नहीं थे।

संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की कम्युनिकेशंस डायरेक्टर जूलियट तौमा का कहना है कि एजेंसी यौन शोषण के प्रति “ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी” अपनाती है और हर रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता है। उनका दावा है कि किसी भी शिकायत के लिए सबूत की अनिवार्यता नहीं है।

गाज़ा की महिलाएं इस समय दोहरी लड़ाई लड़ रही हैं—एक तरफ युद्ध और भूख, दूसरी तरफ शोषण और असुरक्षा। यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए इंसानियत और मानवाधिकारों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

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