भारतीय लोकतंत्र में महिला आरक्षण: सम्मान की प्रतीक नारी को कब मिलेगी बराबरी की हिस्सेदारी?
भारतीय परंपरा में “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” जैसे श्लोक नारी सम्मान का संदेश देते हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह आदर्श पूरी तरह साकार नहीं हो पाया। आजादी के बाद यह उम्मीद की गई थी कि समय के साथ महिलाओं की भागीदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी, मगर दशकों बाद भी संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या सीमित बनी रही।
महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की मांग 20वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में और तेज हुई। विभिन्न महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं ने संसद एवं विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई। हालांकि लगभग सभी राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से इस विचार के समर्थन में दिखे, लेकिन जब इसे लागू करने की बात आई तो अलग-अलग प्रकार की राजनीतिक अड़चनें सामने आने लगीं।
महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 1996 में संसद में पेश किया गया। इसके बाद कई बार अलग-अलग सरकारों ने इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से यह अटक गया। कभी आरक्षण के भीतर पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग उठी, तो कभी राजनीतिक दलों के भीतर सीटों के समीकरण बिगड़ने का डर सामने आया।
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान 1998, 1999, 2002 और 2003 में महिला आरक्षण विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिशें हुईं। हालांकि भारी विरोध और हंगामे के कारण यह कानून नहीं बन सका। बाद में यूपीए सरकार के समय भी इस पर चर्चा जारी रही और 2010 में यह राज्यसभा से पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में लंबित रहने के कारण अंततः विधेयक निष्प्रभावी हो गया।
वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ, जिसे महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया। इस कानून ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मार्ग प्रशस्त किया। हालांकि इसके लागू होने को परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया से जोड़े जाने के कारण तत्काल प्रभाव से इसे लागू नहीं किया जा सका।
महिला आरक्षण के मुद्दे ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का प्रश्न अब भी जटिल बना हुआ है। कई दलों और नेताओं को आशंका रहती है कि आरक्षण लागू होने से उनके पारंपरिक राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि वर्षों से यह विषय राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहमति के बीच उलझा हुआ है।
इसके बावजूद यह भी सच है कि महिलाओं की भागीदारी के बिना लोकतंत्र की पूर्णता संभव नहीं है। देश की आधी आबादी को नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में समान अवसर मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है। महिला आरक्षण केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और समानता का भी प्रश्न है।
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल अपने तात्कालिक हितों से ऊपर उठकर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। यदि भारतीय समाज वास्तव में नारी को सम्मान और शक्ति का प्रतीक मानता है, तो उसे लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों पर भी समान स्थान देना होगा। तभी लोकतंत्र में वास्तविक समावेश और संतुलन स्थापित हो सकेगा।
