महिला सुरक्षा: कागजी व्यवस्था से आगे जमीनी जवाबदेही की दरकार
(डॉ. दीपक गोस्वामी—विनायक फीचर्स)
सड़क खुली है, बाजार खुला है, बस चल रही है, पार्क खुला है, फिर भी बेटी के लिए रास्ता सुरक्षित क्यों नहीं? यह प्रश्न किसी एक शहर, किसी एक सरकार, किसी एक पुलिस थाने या किसी एक अपराधी तक सीमित नहीं है। यह उस संवैधानिक व्यवस्था की परीक्षा है, जो प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देती है।
संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन अधिकारों का अर्थ केवल जीवन की रक्षा भर नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि कोई नागरिक सार्वजनिक जीवन में भय के कारण अपने कदम सीमित करने को मजबूर न हो। जिस सड़क पर बेटे का अधिकार है, उसी सड़क पर बेटी का भी अधिकार है। फिर बार-बार ऐसा क्यों होता है कि लड़की घर से निकलती है तो परिवार की चिंता उसके कदमों से पहले चलने लगती है?

28 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में सामने आई हालिया बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय के समक्ष दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय किशोरी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और चलती स्लीपर बस में नाबालिग से कथित सामूहिक दुष्कर्म समेत कई मामलों का संदर्भ आया। न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्र बनने से रोकने और सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाए।
यह किसी आरोपी की दोषसिद्धि का निर्णय नहीं है। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल जरूर सामने आता है—क्या हमारी व्यवस्था अपराध होने के बाद सक्रिय होने से आगे बढ़कर अपराध की संभावना को पहले पहचानने और उसे कम करने में सक्षम हुई है?
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
दिल्ली के आस्था कुंज पार्क की घटना में पुलिस के अनुसार आरोपियों पर स्वयं को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके मित्र को अलग करने का आरोप है। इसी तरह चलती स्लीपर बस में नाबालिग के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा को भी सवालों के घेरे में ला दिया। इन घटनाओं के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई है।
यहां पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी है—आरोप को आरोप ही लिखना, न्यायिक निष्कर्ष को आरोप से अलग रखना और पीड़िता की पहचान की रक्षा करना। लेकिन दूसरी जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है—घटना के पीछे छिपे व्यवस्था के छेद को पहचानना।
समस्या यह नहीं है कि व्यवस्था बिल्कुल नहीं है। समस्या यह है कि वह अंतिम छोर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है।
व्यवस्था बनी है, लेकिन क्या वह जमीन पर चल रही है?
महिला सुरक्षा के लिए देश में संस्थागत ढांचा मौजूद है। निर्भया फंड के तहत वित्त वर्ष 2024-25 तक कुल 7,712.85 करोड़ रुपये आवंटित किए जा चुके थे। संसद में उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा इस फंड से 6,232.83 करोड़ रुपये जारी और उपयोग किए गए थे। इस फंड के तहत महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं को सहायता दी जाती है।
आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली 112, महिला हेल्पलाइन 181, वन स्टॉप सेंटर, महिला सहायता डेस्क, त्वरित न्यायालय, सुरक्षित शहर परियोजनाएं और अन्य सुरक्षा उपाय इसी व्यापक संस्थागत ढांचे का हिस्सा हैं। इसलिए यह कहना कि महिला सुरक्षा के लिए सरकारों ने कोई व्यवस्था बनाई ही नहीं, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन यहीं से अगला और अधिक असुविधाजनक प्रश्न पैदा होता है—व्यवस्था बनी, तो क्या व्यवस्था चलती भी है?
कैमरा लगा होना और कैमरे की निगरानी होना दो अलग बातें हैं। हेल्पलाइन का नंबर उपलब्ध होना और संकट की घड़ी में प्रभावी सहायता मिलना दो अलग बातें हैं। महिला सहायता डेस्क का बोर्ड लगा होना और वहां प्रशिक्षित तथा संवेदनशील सहायता उपलब्ध होना दो अलग बातें हैं। बस में सुरक्षा उपकरण होना और संकट के समय उनका काम करना भी दो अलग बातें हैं।
यानी चुनौती अब केवल व्यवस्था बनाने की नहीं है। चुनौती है—व्यवस्था को जमीन पर जीवित और जवाबदेह रखना।
हाल की घटनाओं के बाद दिल्ली के कई पार्कों और संवेदनशील स्थानों में सीसीटीवी और प्रकाश व्यवस्था की कमियों की ओर भी ध्यान गया है। दिल्ली पुलिस ने कुछ स्थानों पर अतिरिक्त कैमरों और रोशनी की जरूरत बताई है। इससे स्पष्ट होता है कि सुरक्षा का सवाल केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, उनके वास्तविक क्रियान्वयन और रखरखाव से जुड़ा है।
सुरक्षा का प्रमाण बजट नहीं, नागरिक का व्यवहार है
किसी शहर को सुरक्षित घोषित करने का सबसे सरल तरीका यह नहीं होना चाहिए कि वहां कितने कैमरे लगाए गए हैं। असली सवाल यह है कि शाम को कॉलेज से लौटती लड़की क्या सोचती है।
क्या वह निर्भय होकर बस में बैठती है?
क्या वह सुनसान रास्ते से गुजरते समय सहायता की व्यवस्था जानती है?
क्या उसे भरोसा है कि आपात स्थिति में मदद समय पर पहुंचेगी?
क्या उसके परिवार को हर शाम यह संदेश भेजना पड़ता है—“कहां पहुंची?”
क्या वह किसी पार्क में बैठने से पहले यह सोचती है कि वहां कोई निगरानी व्यवस्था है भी या नहीं?
यदि नागरिक अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करने से पहले अपने भय की गणना करने लगे, तो समस्या केवल अपराध की नहीं रहती। यह सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता और नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाती है।
अपराध के बाद पुलिस की गति जरूरी, अपराध से पहले व्यवस्था की आंख उससे भी जरूरी
अपराध होने के बाद प्राथमिकी, गिरफ्तारी, जांच और अभियोजन आवश्यक हैं। लेकिन आधुनिक महिला सुरक्षा इससे पहले शुरू होती है।
कौन से स्थान बार-बार शिकायतों के केंद्र बन रहे हैं? कहां प्रकाश व्यवस्था खराब है? कहां सार्वजनिक परिवहन को लेकर लगातार शिकायतें आ रही हैं? कहां स्कूल-कॉलेज से लौटने वाली छात्राओं को परिवहन संबंधी परेशानी होती है? कहां रात में सार्वजनिक उपस्थिति अचानक समाप्त हो जाती है? और कहां पहले से दर्ज शिकायतों के बावजूद वही जोखिम दोबारा सामने आ रहा है?
पुलिसिंग को केवल घटना-आधारित नहीं, बल्कि जोखिम-आधारित भी होना होगा।
जिस स्थान पर लगातार शिकायतें मिल रही हैं, वहां अपराध होने के बाद पुलिस भेजना प्रतिक्रिया है। अपराध होने से पहले वहां पुलिस की उपस्थिति, प्रकाश व्यवस्था, निगरानी और त्वरित सहायता बढ़ाना रोकथाम है। आधुनिक सार्वजनिक सुरक्षा का अंतर इसी में छिपा है।
केवल कठोर कानून नहीं, कानून के निश्चित और समयबद्ध पालन की जरूरत
महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए मौजूदा कानूनों में गंभीर दंडात्मक प्रावधान हैं। इसलिए प्रत्येक घटना के बाद केवल कानून को और कठोर बनाने की मांग करना समस्या का पूरा समाधान नहीं हो सकता।
अपराधी के मन में भय केवल दंड की अधिकतम अवधि से नहीं पैदा होता। वह भय तब पैदा होता है जब उसे यह विश्वास हो कि पकड़े जाने की संभावना वास्तविक है, साक्ष्य सुरक्षित रहेंगे, जांच में अनावश्यक देरी नहीं होगी, गवाहों की सुरक्षा होगी, मुकदमा अनिश्चितकाल तक नहीं खिंचेगा और दोष सिद्ध होने पर कानून प्रभावी रूप से लागू होगा।
इसलिए महिला सुरक्षा को केवल पुलिस की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं है। पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक विशेषज्ञ, न्यायपालिका और प्रशासन—सभी की भूमिका इसमें जुड़ी हुई है।
मात्र मुकदमा दर्ज होना न्याय मिलना नहीं है।
इसीलिए अपराध के आंकड़ों को समझते समय भी सावधानी जरूरी है। दर्ज मामलों की संख्या अपराध की गंभीरता का महत्वपूर्ण संकेत देती है, लेकिन वह अपने-आप में अपराध की वास्तविक कुल संख्या नहीं बताती। इसी तरह किसी वर्ष निपटाए गए मामलों में दोषसिद्धि का प्रतिशत सीधे उसी वर्ष दर्ज कुल मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
इसलिए आंकड़ों को राजनीतिक या सामाजिक नारे में बदलने के बजाय उनकी पूरी संरचना समझना जरूरी है।
सवाल होना चाहिए—कितने मामले दर्ज हुए? कितनी जांच समय पर पूरी हुई? कितने मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई? कितने मामलों में दोष सिद्ध हुआ? और कितने मामले वर्षों तक लंबित रहे?
इन सवालों के बीच एक मानवीय सवाल भी है—लंबी न्यायिक प्रक्रिया की कीमत किसने चुकाई? पीड़िता ने, उसके परिवार ने, गवाहों ने और अंततः न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता ने।
नाबालिग पीड़िता की पहचान की रक्षा समाज और मीडिया की जिम्मेदारी
नाबालिग पीड़िता के मामलों में मीडिया और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। पॉक्सो कानून बच्चों की पहचान उजागर करने पर रोक लगाता है। इसलिए नाम, पता, फोटो, विद्यालय, परिवार या ऐसी कोई भी जानकारी प्रकाशित करने से बचना जरूरी है जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती हो।
मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में यह जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण हो गई है। किसी अपराध का वीडियो बनाकर उसे प्रसारित करना पीड़िता के लिए घटना के बाद भी मानसिक और सामाजिक पीड़ा को बढ़ा सकता है।
वीडियो हटाना केवल डिजिटल सफाई नहीं है। यह पीड़िता की गरिमा और निजता की रक्षा का हिस्सा है।
किसी घटना का वीडियो आगे भेजने वाला व्यक्ति यह तर्क नहीं दे सकता कि उसने स्वयं अपराध नहीं किया। डिजिटल प्रसार पीड़िता की पहचान, भय और सामाजिक अपमान को बढ़ा सकता है।
बेटी की स्वतंत्रता को खतरा मान लेना समाधान नहीं
समाज की एक बड़ी भूल यह है कि सुरक्षा का समाधान बेटी की स्वतंत्रता सीमित करने में खोजा जाए।
“शाम से पहले घर आ जाना।”
“अकेले मत जाना।”
“उस रास्ते से मत जाना।”
“लड़कों के साथ मत बैठना।”
“बस में सावधान रहना।”
इन सलाहों में माता-पिता की चिंता होती है और व्यक्तिगत स्तर पर सावधानी जरूरी भी है। लेकिन यदि पूरी सामाजिक व्यवस्था का समाधान अंततः लड़की के कदम छोटे करने में बदल जाए, तो अपराधी की स्वतंत्रता सीमित करने के बजाय पीड़िता की स्वतंत्रता सीमित होने लगती है।
लड़की का पार्क में बैठना अपराध नहीं है।
बस में अकेले यात्रा करना अपराध नहीं है।
कॉलेज जाना अपराध नहीं है।
बाजार जाना अपराध नहीं है।
रात की पाली में काम करना भी अपराध नहीं है।
अपराध वह है जो अपराधी करता है।
यह एक वाक्य समाज की चेतना में गहराई तक उतरना चाहिए।
संस्कार जरूरी हैं, लेकिन केवल संस्कार पर्याप्त नहीं
यौन अपराधों की चर्चा होते ही अक्सर कहा जाता है कि समाज में संस्कारों की कमी हो गई है। सम्मान, सहमति, मर्यादा, आत्मनियंत्रण और दूसरे मनुष्य को वस्तु न समझने की शिक्षा निश्चित रूप से बचपन से दी जानी चाहिए।
लेकिन अपराध को केवल संस्कारों की कमी का परिणाम मान लेना भी प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से अधूरा है।
अपराध को प्रभावित करने वाली कई परतें हैं—परिवार, विद्यालय, डिजिटल वातावरण, नशे की उपलब्धता, सार्वजनिक स्थानों की संरचना, पुलिस की उपस्थिति, कानून का पालन, साक्ष्य की गुणवत्ता, न्याय की गति और अपराध के बाद समाज की प्रतिक्रिया।
संस्कार मनुष्य को भीतर से रोकते हैं, कानून बाहर से सीमा खींचता है और व्यवस्था उस सीमा को लागू करती है। हमें तीनों चाहिए।
अब नारों से आगे मापी जा सकने वाली जवाबदेही चाहिए
अब केवल नए नारे नहीं, बल्कि मापी जा सकने वाली जवाबदेही चाहिए।
हर संवेदनशील सार्वजनिक स्थान का सुरक्षा मानचित्र तैयार हो। बार-बार शिकायत वाले स्थानों की अलग निगरानी हो। खराब प्रकाश व्यवस्था की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो।
सार्वजनिक परिवहन में चालक और स्टाफ का सत्यापन, वाहन की लोकेशन निगरानी और शिकायत तंत्र का नियमित परीक्षण किया जाए। आपातकालीन प्रणालियों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर न हो कि कितनी कॉल आईं या कितने संसाधन उपलब्ध हैं, बल्कि इस आधार पर भी हो कि संकट की स्थिति में वास्तविक प्रतिक्रिया कितनी तेज और प्रभावी रही।
पुलिस थाने में महिला सहायता डेस्क केवल एक कमरा या बोर्ड न हो। वह प्रशिक्षित, संवेदनशील और प्रभावी सहायता केंद्र बने।
यौन अपराधों की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य, फोरेंसिक क्षमता और अभियोजन के बीच बेहतर समन्वय हो। पीड़िता को न्याय की प्रक्रिया में केवल मामले की गवाह नहीं, बल्कि अधिकार और गरिमा वाली नागरिक के रूप में देखा जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—जिस विभाग की जो जिम्मेदारी है, उसके काम का सार्वजनिक प्रदर्शन-आकलन होना चाहिए।
कितनी सड़कें सुरक्षित हुईं?
कितने जोखिम वाले स्थान सुधारे गए?
कितनी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई?
कितनी जांच समय पर पूरी हुईं?
कितने गवाहों को सुरक्षा मिली?
कितनी पीड़िताओं को आवश्यक सहायता मिली?
महिला सुरक्षा को इन परिणामों से मापा जाना चाहिए।
जवाबदेही हो, लेकिन कानून के दायरे में
किसी क्षेत्र में अपराध हो गया, इसलिए संबंधित अधिकारी को स्वतः दोषी ठहरा देना न्याय नहीं है। लेकिन यदि जांच में सामने आए कि शिकायत की उपेक्षा हुई, निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, सुरक्षा व्यवस्था जानबूझकर निष्क्रिय छोड़ी गई या कर्तव्य में प्रमाणित लापरवाही हुई, तो जवाबदेही से बचना भी न्याय नहीं है।
न तो भीड़ का न्याय, न प्रशासन की ढाल—केवल कानून का शासन।
यही संवैधानिक संतुलन है।
सबसे पहले अपराध का उत्तरदायित्व अपराधी का है। इसके बाद उस व्यवस्था की जवाबदेही बनती है जो अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध साधनों का उपयोग नहीं करती। वह परिवहन तंत्र भी जवाबदेह है जो निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन नहीं करता। वह प्रशासनिक तंत्र भी जवाबदेह है जो बार-बार सामने आ रहे जोखिमों को पहचानने के बावजूद सुधार नहीं करता। जांच व्यवस्था भी जवाबदेह है यदि वह वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में विफल रहती है।
न्यायपालिका को लेकर भी चर्चा तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया के दायरे में होनी चाहिए, क्योंकि न्यायिक व्यवस्था निष्पक्ष सुनवाई और कानून की निर्धारित प्रक्रिया के भीतर काम करती है।
और समाज भी तब जवाबदेह है जब वह अपराधी से सवाल पूछने के बजाय पीड़िता के चरित्र की जांच शुरू कर देता है। मीडिया तब जवाबदेह है जब वह सनसनी को खबर और पीड़िता की पहचान को सामग्री बना देता है। डिजिटल समाज तब जवाबदेह है जब किसी की त्रासदी को केवल आगे भेजने योग्य वीडियो समझ लेता है।
सुरक्षित शहर वह है जहां डर नहीं, भरोसा हो
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी बेटी को सुरक्षित रहने के लिए अपनी स्वतंत्रता छोड़नी होगी?
यदि सुरक्षा की कीमत स्वतंत्रता है, तो सुरक्षा की हमारी परिभाषा पर फिर से विचार करना होगा।
सुरक्षित शहर वह नहीं जहां लड़कियों को जल्दी घर लौटना पड़े। सुरक्षित शहर वह है जहां उन्हें जल्दी लौटने की मजबूरी नहीं, सुरक्षित लौटने का विश्वास हो।
सुरक्षित बस वह नहीं जिसमें अपराध होने के बाद पुलिस पहुंच जाए। सुरक्षित बस वह है जिसमें अपराध की संभावना को पहले ही गंभीरता से लिया गया हो।
सुरक्षित पार्क वह नहीं जहां घटना के बाद कैमरे खोजे जाएं। सुरक्षित पार्क वह है जहां प्रकाश, दृश्यता, निगरानी और त्वरित सहायता पहले से मौजूद हों।
सुरक्षित समाज वह नहीं जो बेटी से कहे—“तुम बाहर मत निकलो।”
सुरक्षित समाज वह है जो अपराधी से कहे—“तुम्हारी वजह से किसी नागरिक की स्वतंत्रता छोटी नहीं होगी।”
यही इस पूरे प्रश्न का संवैधानिक केंद्र है।
लाड़ली बिटिया को सुरक्षा के नाम पर घर की चारदीवारी में वापस धकेलना समाधान नहीं है। उसे निर्भय होकर सड़क पर चलने का अधिकार देना समाधान की दिशा है।
क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल संसद के भीतर नहीं होती।
उसकी असली परीक्षा उस सड़क पर होती है, जहां रात उतर रही हो, एक लड़की अकेली घर लौट रही हो और उसके माता-पिता को फोन पर यह पूछने की जरूरत न पड़े—
“बेटी, कहां पहुंची?”
बल्कि उन्हें विश्वास हो—
“भारत का संविधान उसके साथ चल रहा है।”
