विश्व आदिवासी दिवस विशेष: जल, जंगल और जमीन पर अधिकार की लड़ाई अब भी जारी

World Tribal Day Special: The struggle for rights over water, forests, and land continues.
 
भारत की कुल आबादी में आदिवासी समुदाय की हिस्सेदारी करीब 8.6 प्रतिशत है, लेकिन विकास परियोजनाओं, खनन, बांध, औद्योगिक परियोजनाओं और वन संबंधी गतिविधियों के कारण विस्थापन का भार इस समुदाय पर अनुपातहीन रूप से पड़ा है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपने प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहा है।  विकास की कीमत कौन चुका रहा है?  बड़े बांधों, खनन परियोजनाओं, औद्योगिक गलियारों, वन्यजीव अभयारण्यों और अन्य विकास योजनाओं के कारण अनेक आदिवासी परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन और निवास स्थान छोड़ना पड़ा है। विस्थापन केवल घर और जमीन छिनने तक सीमित नहीं रहता। इसके साथ समुदाय का सामाजिक ताना-बाना, पारंपरिक रोजगार, सांस्कृतिक स्थल और प्रकृति से जुड़ा जीवन भी प्रभावित होता है।  जंगल आदिवासी समाज के लिए केवल आय का साधन नहीं है। लघु वनोपज, औषधीय पौधे, लकड़ी, कृषि और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ उनकी आजीविका का हिस्सा रहे हैं। जब उन्हें इन संसाधनों से दूर किया जाता है तो केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवन-पद्धति भी प्रभावित होती है।  विस्थापित परिवारों को मिलने वाला आर्थिक मुआवजा कई बार उनके वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता। पुनर्वास की प्रक्रिया में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं मिलने से अनेक परिवार लंबे समय तक आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं।  शिक्षा और स्वास्थ्य अब भी बड़ी चुनौती  आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पोषण और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता आज भी एक बड़ी चुनौती है। कुपोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी जैसी समस्याएं अनेक समुदायों के विकास को प्रभावित करती हैं।  युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर भी पलायन को बढ़ावा देते हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में युवा दूसरे शहरों और राज्यों की ओर जाने को मजबूर होते हैं।  मध्य प्रदेश में विस्थापन का प्रश्न  मध्य प्रदेश देश के प्रमुख आदिवासी बहुल राज्यों में शामिल है। राज्य की बड़ी आदिवासी आबादी लंबे समय से सिंचाई परियोजनाओं, खनन, वन क्षेत्रों और अन्य विकास गतिविधियों से जुड़े विस्थापन के प्रभावों का सामना करती रही है।  नर्मदा घाटी से जुड़ी परियोजनाओं सहित विभिन्न विकास योजनाओं ने भूमि, जंगल और आजीविका से जुड़े प्रश्नों को सामने रखा है। विस्थापन के बाद आदिवासी परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पारंपरिक अर्थव्यवस्था को नए वातावरण में पुनर्स्थापित करना होती है।  जंगल और खेती से जुड़े उनके पारंपरिक रोजगार समाप्त होने के बाद केवल नकद मुआवजा लंबे समय तक आर्थिक सुरक्षा नहीं दे सकता। इसलिए पुनर्वास की नीति ऐसी होनी चाहिए जिसमें भूमि, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता को भी महत्व मिले।  विकास का मॉडल आदिवासियों की भागीदारी के बिना अधूरा  आदिवासी समुदायों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विकास की दिशा तय करते समय स्वयं आदिवासी समाज की राय कितनी सुनी जाती है।  आदिवासी समुदायों की अपनी जीवनशैली, भाषा, संस्कृति, इतिहास, परंपराएं और प्रकृति के साथ संबंध हैं। इसलिए विकास का कोई भी मॉडल तभी टिकाऊ माना जा सकता है, जब उसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनकी सहमति को प्राथमिकता दी जाए।  विकास का उद्देश्य केवल बड़े निवेश, औद्योगिक उत्पादन या आर्थिक वृद्धि बढ़ाना नहीं होना चाहिए। उसकी सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि परियोजना से प्रभावित लोगों के जीवन, आजीविका और अधिकारों की कितनी सुरक्षा हुई।  ग्राम सभा की भूमिका को मजबूत करना जरूरी  अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका को मजबूत करने के लिए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून महत्वपूर्ण है। इसका मूल उद्देश्य स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक अधिकार और भागीदारी देना है।  इसी तरह वन अधिकार कानून आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन संसाधनों से जुड़े अधिकारों को मान्यता देने का महत्वपूर्ण कानूनी माध्यम है। इन कानूनों की भावना तभी प्रभावी हो सकती है, जब ग्राम सभाओं को वास्तविक अधिकार दिए जाएं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को केवल औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित न रखा जाए।  किसी भी परियोजना के लिए भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से पहले प्रभावित समुदायों की बात सुनी जानी चाहिए। विकास कार्यों में स्थानीय लोगों की सहमति, उचित पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा को अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।  अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है अधिकारों का सवाल  संयुक्त राष्ट्र ने विकास के अधिकार को मानवाधिकारों के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है। वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आदिवासी लोगों के अधिकारों से संबंधित घोषणा को अपनाया, जिसमें आदिवासी समुदायों की पहचान, संस्कृति, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों पर जोर दिया गया।  इन अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का मूल संदेश यही है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास की कीमत सबसे कमजोर समुदायों को अपने अधिकारों से वंचित होकर न चुकानी पड़े।  आदिवासी उपयोजना और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान जरूरी  आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए निर्धारित विकास योजनाओं और संसाधनों का उपयोग उन्हीं क्षेत्रों के वास्तविक विकास में होना चाहिए। स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल, सिंचाई, पोषण और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है।  यदि आदिवासी क्षेत्रों के लिए निर्धारित संसाधनों का अपेक्षित उपयोग नहीं होता, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़े अंतर को दूर करना कठिन हो जाएगा। विकास योजनाओं की नियमित निगरानी और सामाजिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया जाना चाहिए।  जल-जंगल-जमीन केवल संसाधन नहीं, पहचान का आधार  आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन का संबंध केवल आर्थिक नहीं है। यह उनकी संस्कृति, परंपरा, सामाजिक संरचना और पहचान से जुड़ा हुआ है। उनके पर्व, लोकगीत, लोकनृत्य, खान-पान और जीवन पद्धति प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते को दर्शाते हैं।  इसलिए किसी क्षेत्र के विकास की योजना बनाते समय वहां रहने वाले समुदाय के सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को भी समझना आवश्यक है। प्रकृति से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए तो संरक्षण और आजीविका दोनों के बेहतर रास्ते निकाले जा सकते हैं।  विश्व आदिवासी दिवस बने आत्ममंथन का अवसर  9 अगस्त को आदिवासी संस्कृति, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और कला का प्रदर्शन जरूर होता है, लेकिन इस अवसर पर उन मूल सवालों पर भी चर्चा होनी चाहिए जिनका संबंध भूमि अधिकार, विस्थापन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधनों और संवैधानिक संरक्षण से है।  विश्व आदिवासी दिवस केवल सांस्कृतिक उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि यह सरकारों, समाज और नीति-निर्माताओं के लिए आत्ममंथन और जवाबदेही का अवसर बने। आदिवासी विकास का अर्थ केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि मौजूदा संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को जमीन पर प्रभावी रूप से लागू करना है।  ऐसा विकास मॉडल तैयार करना होगा जिसमें परियोजनाओं से प्रभावित लोगों की भागीदारी हो, ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत हो, उचित पुनर्वास सुनिश्चित हो और जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों का सम्मान किया जाए।  वास्तविक समावेशी विकास वही होगा जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और समुदायों के अधिकारों की भी रक्षा हो। जब तक आदिवासी समाज को विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी।  विश्व आदिवासी दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही होना चाहिए कि आदिवासी समाज को केवल सम्मान और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, संसाधनों, संस्कृति और भविष्य पर सार्थक भागीदारी चाहिए। यही संवैधानिक न्याय और टिकाऊ विकास की दिशा में वास्तविक कदम होगा।  (विनायक फीचर्स)

(राजकुमार सिन्हा—विनायक फीचर्स)

हर वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस दुनिया भर के मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति, परंपराओं और उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है। भारत के संदर्भ में यह दिन आदिवासी समाज के सामने मौजूद उन चुनौतियों पर विचार करने का भी अवसर है, जिनका संबंध उनकी पहचान, आजीविका और जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों से है।

भारत की कुल आबादी में आदिवासी समुदाय की हिस्सेदारी करीब 8.6 प्रतिशत है, लेकिन विकास परियोजनाओं, खनन, बांध, औद्योगिक परियोजनाओं और वन संबंधी गतिविधियों के कारण विस्थापन का भार इस समुदाय पर अनुपातहीन रूप से पड़ा है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर के अनेक क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपने प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहा है।

विकास की कीमत कौन चुका रहा है?

बड़े बांधों, खनन परियोजनाओं, औद्योगिक गलियारों, वन्यजीव अभयारण्यों और अन्य विकास योजनाओं के कारण अनेक आदिवासी परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन और निवास स्थान छोड़ना पड़ा है। विस्थापन केवल घर और जमीन छिनने तक सीमित नहीं रहता। इसके साथ समुदाय का सामाजिक ताना-बाना, पारंपरिक रोजगार, सांस्कृतिक स्थल और प्रकृति से जुड़ा जीवन भी प्रभावित होता है।

जंगल आदिवासी समाज के लिए केवल आय का साधन नहीं है। लघु वनोपज, औषधीय पौधे, लकड़ी, कृषि और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ उनकी आजीविका का हिस्सा रहे हैं। जब उन्हें इन संसाधनों से दूर किया जाता है तो केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवन-पद्धति भी प्रभावित होती है।

विस्थापित परिवारों को मिलने वाला आर्थिक मुआवजा कई बार उनके वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता। पुनर्वास की प्रक्रिया में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं मिलने से अनेक परिवार लंबे समय तक आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य अब भी बड़ी चुनौती

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पोषण और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता आज भी एक बड़ी चुनौती है। कुपोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी जैसी समस्याएं अनेक समुदायों के विकास को प्रभावित करती हैं।

युवाओं के सामने रोजगार के सीमित अवसर भी पलायन को बढ़ावा देते हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में युवा दूसरे शहरों और राज्यों की ओर जाने को मजबूर होते हैं।

मध्य प्रदेश में विस्थापन का प्रश्न

मध्य प्रदेश देश के प्रमुख आदिवासी बहुल राज्यों में शामिल है। राज्य की बड़ी आदिवासी आबादी लंबे समय से सिंचाई परियोजनाओं, खनन, वन क्षेत्रों और अन्य विकास गतिविधियों से जुड़े विस्थापन के प्रभावों का सामना करती रही है।

नर्मदा घाटी से जुड़ी परियोजनाओं सहित विभिन्न विकास योजनाओं ने भूमि, जंगल और आजीविका से जुड़े प्रश्नों को सामने रखा है। विस्थापन के बाद आदिवासी परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पारंपरिक अर्थव्यवस्था को नए वातावरण में पुनर्स्थापित करना होती है।

जंगल और खेती से जुड़े उनके पारंपरिक रोजगार समाप्त होने के बाद केवल नकद मुआवजा लंबे समय तक आर्थिक सुरक्षा नहीं दे सकता। इसलिए पुनर्वास की नीति ऐसी होनी चाहिए जिसमें भूमि, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता को भी महत्व मिले।

विकास का मॉडल आदिवासियों की भागीदारी के बिना अधूरा

आदिवासी समुदायों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विकास की दिशा तय करते समय स्वयं आदिवासी समाज की राय कितनी सुनी जाती है।

आदिवासी समुदायों की अपनी जीवनशैली, भाषा, संस्कृति, इतिहास, परंपराएं और प्रकृति के साथ संबंध हैं। इसलिए विकास का कोई भी मॉडल तभी टिकाऊ माना जा सकता है, जब उसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनकी सहमति को प्राथमिकता दी जाए।

विकास का उद्देश्य केवल बड़े निवेश, औद्योगिक उत्पादन या आर्थिक वृद्धि बढ़ाना नहीं होना चाहिए। उसकी सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि परियोजना से प्रभावित लोगों के जीवन, आजीविका और अधिकारों की कितनी सुरक्षा हुई।

ग्राम सभा की भूमिका को मजबूत करना जरूरी

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका को मजबूत करने के लिए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून महत्वपूर्ण है। इसका मूल उद्देश्य स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक अधिकार और भागीदारी देना है।

इसी तरह वन अधिकार कानून आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन संसाधनों से जुड़े अधिकारों को मान्यता देने का महत्वपूर्ण कानूनी माध्यम है। इन कानूनों की भावना तभी प्रभावी हो सकती है, जब ग्राम सभाओं को वास्तविक अधिकार दिए जाएं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को केवल औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित न रखा जाए।

किसी भी परियोजना के लिए भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से पहले प्रभावित समुदायों की बात सुनी जानी चाहिए। विकास कार्यों में स्थानीय लोगों की सहमति, उचित पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा को अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है अधिकारों का सवाल

संयुक्त राष्ट्र ने विकास के अधिकार को मानवाधिकारों के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है। वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आदिवासी लोगों के अधिकारों से संबंधित घोषणा को अपनाया, जिसमें आदिवासी समुदायों की पहचान, संस्कृति, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों पर जोर दिया गया।

इन अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का मूल संदेश यही है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास की कीमत सबसे कमजोर समुदायों को अपने अधिकारों से वंचित होकर न चुकानी पड़े।

आदिवासी उपयोजना और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान जरूरी

आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए निर्धारित विकास योजनाओं और संसाधनों का उपयोग उन्हीं क्षेत्रों के वास्तविक विकास में होना चाहिए। स्कूल, अस्पताल, सड़क, पेयजल, सिंचाई, पोषण और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है।

यदि आदिवासी क्षेत्रों के लिए निर्धारित संसाधनों का अपेक्षित उपयोग नहीं होता, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़े अंतर को दूर करना कठिन हो जाएगा। विकास योजनाओं की नियमित निगरानी और सामाजिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया जाना चाहिए।

जल-जंगल-जमीन केवल संसाधन नहीं, पहचान का आधार

आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल और जमीन का संबंध केवल आर्थिक नहीं है। यह उनकी संस्कृति, परंपरा, सामाजिक संरचना और पहचान से जुड़ा हुआ है। उनके पर्व, लोकगीत, लोकनृत्य, खान-पान और जीवन पद्धति प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते को दर्शाते हैं।

इसलिए किसी क्षेत्र के विकास की योजना बनाते समय वहां रहने वाले समुदाय के सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को भी समझना आवश्यक है। प्रकृति से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए तो संरक्षण और आजीविका दोनों के बेहतर रास्ते निकाले जा सकते हैं।

विश्व आदिवासी दिवस बने आत्ममंथन का अवसर

9 अगस्त को आदिवासी संस्कृति, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और कला का प्रदर्शन जरूर होता है, लेकिन इस अवसर पर उन मूल सवालों पर भी चर्चा होनी चाहिए जिनका संबंध भूमि अधिकार, विस्थापन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधनों और संवैधानिक संरक्षण से है।

विश्व आदिवासी दिवस केवल सांस्कृतिक उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि यह सरकारों, समाज और नीति-निर्माताओं के लिए आत्ममंथन और जवाबदेही का अवसर बने। आदिवासी विकास का अर्थ केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि मौजूदा संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को जमीन पर प्रभावी रूप से लागू करना है।

ऐसा विकास मॉडल तैयार करना होगा जिसमें परियोजनाओं से प्रभावित लोगों की भागीदारी हो, ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत हो, उचित पुनर्वास सुनिश्चित हो और जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों का सम्मान किया जाए।

वास्तविक समावेशी विकास वही होगा जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और समुदायों के अधिकारों की भी रक्षा हो। जब तक आदिवासी समाज को विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी।

विश्व आदिवासी दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही होना चाहिए कि आदिवासी समाज को केवल सम्मान और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, संसाधनों, संस्कृति और भविष्य पर सार्थक भागीदारी चाहिए। यही संवैधानिक न्याय और टिकाऊ विकास की दिशा में वास्तविक कदम होगा।

(विनायक फीचर्स)

Tags