विश्व लिवर दिवस: उत्तर प्रदेश में लिवर से जुड़ी बीमारियों में बढ़ोतरी, डॉक्टरों ने लाइफस्टाइल बदलाव को बताया वजह
डॉ. वलीउल्लाह सिद्दीकी, डायरेक्टर, हेपेटो-पैंक्रियाटो-बिलियरी एवं लिवर ट्रांसप्लांट सर्जरी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ, ने बताया, "नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में लिवर से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। ओपीडी में यह ट्रेंड अब साफ दिख रहा है, हर महीने हम लगभग 300-400 ऐसे मरीज देखते हैं जिन्हें किसी न किसी प्रकार की लिवर से जुड़ी समस्या होती है। बैठे रहने की आदत लोगों में बढ़ती जा रही है, शारीरिक गतिविधि कम हो गई है और प्रोसेस्ड फूड का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जबकि मोटापा और डायबिटीज जैसी स्थितियां तेजी से आम होती जा रही हैं। यह ट्रेंड लखनऊ में तो स्पष्ट दिख रहा है और अब उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में भी उभरने लगा है।“
डॉ. वलीउल्लाह सिद्दीकी ने यह भी बताया कि, एक बड़ी चिंता देर से होने वाली जांच है। “अधिकतर लोग तब ही आते हैं जब समस्या को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है। शुरुआती लक्षण अक्सर छूट जाते हैं या उन्हें हल्के में ले लिया जाता है, और जब तक मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है, कई मामलों में बीमारी सिरोसिस जैसे गंभीर चरण तक पहुंच चुकी होती है।“
डॉक्टरों के अनुसार, लिवर बीमारियों के प्रकार में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर शराब से जुड़ी लिवर बीमारियां अब भी चिंता का विषय हैं, वहीं नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जो अक्सर वजन बढ़ने, खराब खानपान और मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़े होते हैं। कुछ साल पहले की तुलना में अब ऐसे मामले नियमित प्रैक्टिस में कहीं अधिक दिखाई दे रहे हैं, लगभग 30% मामलों में, जो मरीजों की जीवनशैली में हो रहे बदलाव को दर्शाता है।
लिवर की बीमारी, मोटापा और डायबिटीज के बीच गहरा संबंध है। शरीर में अतिरिक्त फैट लिवर में जमा होकर सूजन और लंबे समय में नुकसान का कारण बनता है, यदि इसे समय पर नियंत्रित न किया जाए। इंसुलिन रेजिस्टेंस, जो मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज में आम है, बीमारी की प्रगति को तेज कर देता है। एक चुनौती यह भी है कि लिवर बीमारी के लक्षण देर से दिखाई देते हैं, क्योंकि लिवर दबाव में भी काम करता रहता है। थकान, आंखों का पीला होना, सूजन या पाचन से जुड़ी समस्याएं आमतौर पर तब सामने आती हैं जब बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है।
डॉक्टरों ने जोर दिया कि शुरुआती चरण में हस्तक्षेप करने से नुकसान को कम करते हुए स्थिति को बदला भी जा सकता है। फैटी लिवर में जीवनशैली में बदलाव जैसे वजन नियंत्रण, बेहतर खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि से सुधार संभव है। लेकिन अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह स्थिति फैट जमा होने से फाइब्रोसिस और फिर सिरोसिस तक पहुंच सकती है, जिससे इलाज और जटिल हो जाता है।
डॉ. सिद्दीकी, ने बचाव के लिए आसान उपाय बताते हुए कहा कि, “वजन पर नियंत्रण बनाए रखें, रोज कम से कम 30 मिनट शारीरिक रूप से सक्रिय रहें और प्रोसेस्ड फूड व शराब का सेवन सीमित करें। यह साधारण कदम हैं लेकिन इनका असर बहुत बड़ा होता है। साथ ही जागरूकता, समय पर जांच और लाइफस्टाइल में बदलाव ही गंभीर लिवर बीमारियों से बचाव की कुंजी है।“
