विश्व रेडियो दिवस 2026: रेडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—एआई एक उपकरण है, आवाज़ नहीं
World Radio Day 2026: Radio and Artificial Intelligence—AI is a tool, not a voice
Fri, 13 Feb 2026
( इं. अहमद मुबीन) 13 फ़रवरी को पूरी दुनिया में विश्व रेडियो दिवस 2026 मनाया जा रहा है। इस वर्ष की थीम—
“Radio and Artificial Intelligence: AI is a tool, not the voice”
प्रसारण तंत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है, साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि रेडियो की आत्मा आज भी मानवीय आवाज़, संवेदना और विश्वास में ही निहित है।

भारत में रेडियो प्रसारण को आज लगभग 94 वर्ष पूरे हो चुके हैं, जबकि यह विश्व रेडियो दिवस की 15वीं वर्षगांठ है। टेलीविजन और डिजिटल मीडिया के व्यापक प्रभाव के बावजूद, रेडियो आज भी सबसे सुलभ, भरोसेमंद और प्रभावी जनसंचार माध्यम बना हुआ है।
रेडियो की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुभाषिकता और विविधता है। यह उन लोगों तक भी सूचना पहुँचाता है, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते। दुनिया के किसी भी कोने में, सीमित संसाधनों के साथ भी, रेडियो सुना जा सकता है।
यूनेस्को ने वर्ष 2011 में अपनी 36वीं महासभा में 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस घोषित किया था। इसे पहली बार आधिकारिक रूप से 2012 में मनाया गया। यह तिथि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 13 फ़रवरी 1946 को संयुक्त राष्ट्र के पहले रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई थी।
स्मृतियों में बसा रेडियो
साठ के दशक की शुरुआत में मेरे परिवार में पहली बार रेडियो आया। मेरे चाचा, मरहूम मो. इदरीस इदरीसी, हरदोई की नुमाइश में बाहर से आई एक म्यूजिक पार्टी से फिलिप्स कंपनी का थर्मायोनिक वाल्व तकनीक वाला रेडियो खरीदकर लाए थे, जो आज भी हमारे घर में सुरक्षित है।
उस दौर में बहुत कम घरों में रेडियो हुआ करता था। आस-पड़ोस के लोग हमारे घर के बाहर वाले कमरे में बैठकर बीबीसी लंदन की हिंदी और उर्दू सेवा सुना करते थे।
बाद में ट्रांजिस्टर का ज़माना आया। मेरे वालिद मरहूम मो. यासीन साहब, जो उस समय उन्नाव के राजकीय इंटर कॉलेज में कार्यरत थे, के पास भी फिलिप्स कंपनी का ट्रांजिस्टर था—जो आज भी मेरे पास एक अमूल्य धरोहर की तरह मौजूद है।
छुट्टियों में हम उसी रेडियो पर
विविध भारती का हवामहल,
बुधवार को रेडियो सीलोन से अमीन सायानी की आवाज़ में बिनाका गीतमाला,
बीबीसी उर्दू सेवा पर समाचारों के बाद सहरबीन,
जुमे को खेल के मैदान से और
सनीचर को शाहीन क्लब
बड़े चाव से सुना करते थे।
बीबीसी: विश्वसनीयता का प्रतीक
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उस दौर में बीबीसी रेडियो को जो अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता और विश्वसनीयता प्राप्त थी, वह किसी अन्य रेडियो प्रसारण को हासिल नहीं थी। किसी भी महत्वपूर्ण समाचार की पुष्टि के लिए लोग सबसे पहले बीबीसी के समाचार सुनते थे।
भारत में बीबीसी की हिंदी और उर्दू सेवाएँ अत्यंत लोकप्रिय थीं। इसी का प्रमाण है कि हाल ही में बीबीसी के विश्वप्रसिद्ध पत्रकार मार्क टली के निधन की खबर ने हर रेडियो प्रेमी को गहरे दुःख में डाल दिया।
रेडियो और मेरी पत्रकारिता यात्रा
वर्ष 2004–05 में, पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) और आकाशवाणी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित पीजी डिप्लोमा इन रेडियो प्रसारण (PGDRP) में मैंने दाख़िला लिया और आकाशवाणी लखनऊ से अध्ययन किया।
इसी दौरान मेरी मुलाक़ात जनाब मुबीन ख़ान साहब से हुई, जो उस समय FM Rainbow के प्रभारी थे। उनसे जनसंचार की इस विधा में बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। आज वे आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा के प्रभारी के रूप में दिल्ली में कार्यरत हैं।
इस कोर्स के दौरान
बाराबंकी के पत्रकार मरहूम मो. अतहर,
गवर्नमेंट प्रेस लखनऊ के अधिकारी ऋषि राम भट्ट जी, एवं पल्लवी श्रीवास्तव जी
जैसे नायाब साथियों से परिचय हुआ—ये सभी आज भी स्मृतियों में जीवित हैं।
रेडियो का पुनर्जागरण
टीवी और विशेषकर निजी चैनलों के आगमन के बाद एक समय ऐसा भी आया जब शहरी क्षेत्रों में रेडियो की लोकप्रियता घटने लगी। लेकिन 2000 के बाद, जब सरकार ने एफएम के निजी ऑपरेटरों को लाइसेंस दिए, तो रेडियो को एक नई ऊर्जा मिली।
कम्युनिटी रेडियो ने ग्रामीण और स्थानीय समाज की आवाज़ को मंच दिया।
इसी क्रम में हरदोई का पहला और एकमात्र सामुदायिक रेडियो स्टेशन—
रेडियो जागो 90.4 FM
स्थानीय मुद्दों, संस्कृति और जन-सरोकारों को मजबूती से प्रस्तुत कर रहा है। इसका संचालन शिव शंकर डेवलपमेंट सोसाइटी (SSDS) द्वारा किया जाता है।
रेडियो केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि स्मृतियों, विश्वास और जनचेतना की आवाज़ है—और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
