शोक सभा में साहित्यकार

Literary writers in mourning
 
शोक सभा में साहित्यकार
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)  एक अदद साहित्यकार में अनेक विशेषताएँ होती हैं। मसलन, वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझता भी है और उसे प्रदर्शित भी करता है। ऐसा क्यों होता है, यह गहन अध्ययन का विषय है, किंतु यह तथ्य प्रायः हर जगह देखने को मिल जाता है। अलग दिखने की चाह में उसका पहनावा और बातचीत का अंदाज़ भी सबसे जुदा होता है। वह अपने आप में ही जीता है, आत्ममुग्ध रहता है, मानो वह आम आदमी न होकर संसार का कोई विलक्षण प्राणी और बुद्धिजीवी हो। वह दूसरों की सुनता नहीं, केवल अपनी ही कहता है।

एक साहित्यकार मित्र की मृत्यु के उपरांत आयोजित तेरहवीं के कार्यक्रम में ऐसे ही एक स्वयंभू साहित्यकार से परिचित होने का अवसर मिला। शोक सभा प्रारंभ होने से पहले ही वे एक पॉलिथीन फाइल में टाइप की हुई कविता-नुमा कुछ पंक्तियाँ लेकर पहुँचे थे। साथ में उनकी कुछ शिष्याएँ भी थीं, जो स्वयं को काव्य की विविध विधाओं में पारंगत बता रही थीं। चूँकि दिवंगत साहित्यकार मित्र दोहे और मुक्तकों के अच्छे जानकार थे, इसलिए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए काव्यमयी पंक्तियाँ लिखकर लाई गई थीं।

dtyyt

शोक सभा शुरू होते ही स्वयंभू साहित्यकार महोदय ने संचालक से स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उन्हें सबसे पहले माइक पर बुलाया जाए। उन्होंने दिवंगत साहित्यकार के परिजनों को एक शोक संदेश सौंपना था और दो शब्द कहने थे। कोट-टाई और मफलर में सजे उनका व्यक्तित्व पहले ही प्रभावशाली लग रहा था। संचालक महोदय भी उनसे प्रभावित हुए और संक्षिप्त भूमिका बाँधते हुए उन्हें माइक पर आमंत्रित कर लिया।

महोदय माइक पर आए, दिवंगत साहित्यकार के परिजनों को मंच पर बुलाया और प्लास्टिक-कोटेड शोक संदेश उनके पुत्र के हाथ में थमाकर बोले—अब मैं शोक संदेश पढ़ता हूँ। वे पूरे मनोयोग से काव्यमयी शोक संदेश पढ़ ही रहे थे कि तभी उनकी एक शिष्या मोबाइल हाथ में लेकर अपनी संवेदना व्यक्त करने मंच पर आ खड़ी हुई।

संचालन में दक्ष संचालक महोदय ने बड़ी चतुराई से शिष्या महोदया को बाद में बुलाने का आश्वासन देकर बैठा दिया। इसके बाद एक अन्य स्वयंभू साहित्यकार की बारी आई। उन्होंने भी बिना किसी संकोच के अपनी आत्ममुग्धता का परिचय दिया। दिवंगत साहित्यकार की कृतियों और व्यक्तित्व पर बोलने के बजाय उन्होंने अपने ही साहित्य का गुणगान शुरू कर दिया।

हालाँकि, इसके बाद दूर-दराज़ से आए तथा स्थानीय साहित्यकारों ने सीमित समय में दिवंगत साहित्यकार मित्र की साहित्यिक उपलब्धियों और योगदान पर सार्थक चर्चा की। कुछ काव्यप्रेमी अपनी जेबों में शोक श्रद्धांजलि के दोहे, मुक्तक और कविताएँ लिखकर लाए थे। वे बार-बार जेब से काग़ज़ निकालकर अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे आत्ममुग्ध नहीं थे—यदि होते, तो अपना नाम पहले ही संचालक को बता माइक तक पहुँचने का जुगाड़ कर लेते।बहरहाल, आयोजन चाहे जैसा भी हो, आत्ममुग्ध साहित्यकार अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान सुनिश्चित कर ही लेते हैं।

Tags