उन्नाव के लाल का कमाल: 18 की उम्र में सेना में लेफ्टिनेंट बने यश प्रताप सिंह, किसान पिता का सिर गर्व से ऊँचा

The Triumph of Unnao's Son: Yash Pratap Singh Becomes Army Lieutenant at Age 18, Making His Farmer Father Proud
 
उन्नाव के लाल का कमाल: 18 की उम्र में सेना में लेफ्टिनेंट बने यश प्रताप सिंह, किसान पिता का सिर गर्व से ऊँचा

लखनऊ डेस्क (आर.एल. पाण्डेय):

सपनों को उड़ान देने के लिए ऊँचे आसमान की नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की ज़रूरत होती है। इसे सच कर दिखाया है उन्नाव जनपद के एक छोटे से गाँव हिंदू खेड़ा के होनहार युवक यश प्रताप सिंह ने। मात्र 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट पद पर चयनित होकर यश ने न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे क्षेत्र का नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा दिया है।

किसान परिवार से सफलता का सफर

यश प्रताप सिंह एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। उनके पिता धीरेंद्र प्रताप सिंह खेती-किसानी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं और माता एक कुशल गृहिणी हैं। संसाधनों की कमी कभी यश के हौसलों के आड़े नहीं आई। किसान पिता के पसीने की महक ने यश को देश की मिट्टी की सेवा करने के लिए प्रेरित किया और परिवार ने हर कदम पर उनका साथ निभाया।

ऑल इंडिया 109वीं रैंक के साथ रचा इतिहास

भारतीय सेना में अधिकारी बनने की प्रतिष्ठित परीक्षा में यश ने ऑल इंडिया रैंक 109 हासिल की है। 18 साल की उम्र, जहाँ अधिकतर युवा अपने करियर की दिशा तलाश रहे होते हैं, उस उम्र में इतनी बड़ी सफलता प्राप्त करना उनकी असाधारण प्रतिभा को दर्शाता है।

  • कठिन चयन प्रक्रिया: यश ने एसएसबी (SSB) इंटरव्यू और कड़े मेडिकल परीक्षणों को अपनी मेहनत और अनुशासन के बल पर सफलतापूर्वक पार किया।

गाँव में जश्न का माहौल

जैसे ही यश के चयन की खबर हिंदू खेड़ा पहुँची, पूरा गाँव खुशियों से सराबोर हो गया। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और मिठाई बाँटकर अपनी प्रसन्नता जाहिर की। गाँव के युवाओं के लिए यश अब एक 'रोल मॉडल' बन चुके हैं। बुजुर्गों का कहना है कि यश की इस उपलब्धि ने साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या सुख-सुविधाओं की मोहताज नहीं होती।

"देश सेवा ही सर्वोपरि लक्ष्य"

अपनी इस शानदार सफलता का श्रेय यश ने अपने माता-पिता के त्याग और मार्गदर्शन को दिया है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा जब भी मैं कमजोर पड़ता था, मेरे परिवार का विश्वास मेरी ताकत बन जाता था। अब मेरा एकमात्र लक्ष्य भारतीय सेना में एक निष्ठावान अधिकारी बनकर राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा करना और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाना है।"

प्रेरणादायक संदेश

यश प्रताप सिंह की यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल है जो अभावों में रहकर बड़े सपने देखते हैं। यह सफलता चीख-चीख कर कह रही है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और मेहनत सच्ची, तो सफलता का मार्ग खुद-ब-खुद बन जाता है।

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