जब गांडीव भी भारी हो गया: श्रीकृष्ण के प्रस्थान के बाद अर्जुन की शक्ति का रहस्य

When even the Gandiva became heavy: The secret behind Arjuna's strength after Sri Krishna's departure.
 
जब गांडीव भी भारी हो गया: श्रीकृष्ण के प्रस्थान के बाद अर्जुन की शक्ति का रहस्य

काल का ऐसा भयानक फेर आया कि जिस गांडीव की टंकार से तीनों लोक कांप उठते थे, वही गांडीव महाभारत के बाद अर्जुन के हाथों में भारी बोझ बन गया। जिस अर्जुन ने महाभारत के रणक्षेत्र में असंख्य महारथियों का सामना किया था, वही एक दिन साधारण लुटेरों के सामने असहाय दिखाई दिए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक ही क्षण में उनकी सारी शक्ति जैसे उनसे दूर चली गई?

महाभारत के उत्तरार्ध की कथा के अनुसार, गांधारी के शाप और ऋषियों के श्राप के प्रभाव से यदुवंश का विनाश हुआ। प्रभास क्षेत्र में यादव आपस में ही युद्ध करने लगे और देखते ही देखते पूरा यदुकुल नष्ट हो गया।

इसी क्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपनी नश्वर लीला का संवरण किया। पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न श्रीकृष्ण को जरा नामक बहेलिए का बाण लगा और इसके बाद उन्होंने पृथ्वी की लीला समाप्त कर अपने धाम की ओर प्रस्थान किया।श्रीकृष्ण के प्रयाण से पहले अर्जुन को द्वारका बुलाया गया, ताकि वे वहां बची हुई स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों को सुरक्षित हस्तिनापुर तथा इंद्रप्रस्थ ले जा सकें।

जब अर्जुन द्वारका पहुँचे तो वहां का दृश्य हृदय विदारक था। कभी वैभव और ऐश्वर्य से जगमगाने वाली द्वारका शोक में डूबी थी। महलों से विलाप की आवाजें आ रही थीं। वासुदेव भी अपने प्राण त्याग चुके थे।अर्जुन ने द्वारका के बचे हुए लोगों को एकत्र किया और उन्हें लेकर हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किया। उनके साथ श्रीकृष्ण के परिवार की महिलाएं, बच्चे, वृद्ध तथा बहुमूल्य धन-संपदा भी थी। कथा के अनुसार, द्वारका से अंतिम काफिला निकलते ही समुद्र ने उस नगरी को अपने भीतर समा लिया।

काफिला पंचनद क्षेत्र से होकर गुजर रहा था। तभी आभीर लुटेरों ने उस पर हमला कर दिया। उन्हें लगा कि इतने बड़े काफिले की सुरक्षा के लिए केवल एक प्रमुख योद्धा ही मौजूद है। उन्होंने लाठियों, भालों और अन्य हथियारों के साथ आक्रमण कर दिया।अर्जुन ने लुटेरों को आगे बढ़ते देखा तो उन्हें विश्वास था कि वे अपनी बाण-वर्षा से उन्हें आसानी से रोक देंगे। उन्होंने अपना प्रसिद्ध गांडीव धनुष उठाया।

लेकिन तभी एक अद्भुत परिस्थिति सामने आई।जिस गांडीव को अर्जुन सहजता से संभालते थे, वही उन्हें असाधारण रूप से भारी प्रतीत होने लगा। प्रत्यंचा चढ़ाना भी कठिन हो गया। अर्जुन ने दिव्यास्त्रों का स्मरण करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें वे मंत्र याद नहीं आए।

उन्होंने साधारण बाणों से लुटेरों का सामना करने का प्रयास किया। किंतु कथा के अनुसार, वह अक्षय तूणीर भी इस बार उनका साथ नहीं दे सका। थोड़ी ही देर में बाण समाप्त हो गए।अर्जुन के सामने काफिले को लूटा जाने लगा। धन-संपदा छीन ली गई और कई स्त्रियों को भी लुटेरे अपने साथ ले गए। अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति लगाई, लेकिन वे उन्हें रोक नहीं सके।यह दृश्य उस अर्जुन के लिए असहनीय था, जिसने कभी कुरुक्षेत्र में अकेले ही असंख्य योद्धाओं का सामना किया था।बचे हुए लोगों को किसी तरह इंद्रप्रस्थ पहुँचाने के बाद अर्जुन अत्यंत व्यथित मन से महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुँचे। उनका हृदय पश्चाताप और पीड़ा से भरा था।

उन्होंने महर्षि से कहा—“हे महर्षि! गांडीव वही है, रथ वही है और मैं भी वही अर्जुन हूँ। फिर मेरी शक्ति कहाँ चली गई? जिस कृष्ण के बिना संसार ही शून्य लगता है, उनके चले जाने के बाद मेरा पराक्रम, मेरा पौरुष और मेरी विद्या सब जैसे मुझसे दूर हो गए। मैं अपने प्रभु के परिवार तक की रक्षा नहीं कर सका।”महर्षि वेदव्यास ने अर्जुन को सांत्वना देते हुए उन्हें जीवन का एक गहरा सत्य समझाया।उन्होंने कहा कि अर्जुन का पराक्रम केवल उनका व्यक्तिगत सामर्थ्य नहीं था। जब तक श्रीकृष्ण का संकल्प और उनका उद्देश्य अर्जुन के साथ था, तब तक वही अर्जुन अजेय योद्धा बने रहे।

शक्ति आती भी है और समय आने पर चली भी जाती है।काल ही मनुष्य को सामर्थ्य देता है और काल ही उचित समय आने पर उस सामर्थ्य को वापस ले लेता है। श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन और पांडवों का पृथ्वी पर जो उद्देश्य था, वह पूर्ण हो चुका था।

इसलिए गांडीव का भारी हो जाना केवल एक योद्धा की पराजय नहीं, बल्कि उस सत्य का प्रतीक बन गया कि मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसकी शक्ति और उपलब्धियां भी काल के अधीन हैं।महाभारत की यह कथा हमें यही संदेश देती है कि अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं। सामर्थ्य, सफलता और वैभव स्थायी नहीं हैं। समय बदलते ही परिस्थितियां बदल जाती हैं—और तब मनुष्य को अपने भीतर झांककर यह समझना पड़ता है कि उसकी वास्तविक शक्ति आखिर किसके कारण थी।

Tags