बाराबंकी में कृत्रिम गर्भाधान से पैदा हुए उन्नत नस्ल के हजारों मेमने, महिलाओं ने संभाली कमान

Thousands of High-Breed Lambs Born via Artificial Insemination in Barabanki; Women Take the Lead
 
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बाराबंकी   उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के गांवों में इन दिनों एक खामोश लेकिन बेहद प्रभावशाली बदलाव की गूंज है। यहाँ बकरी पालन का पारंपरिक तरीका अब आधुनिक विज्ञान और महिला सशक्तिकरण का संगम बन चुका है। कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination - AI) तकनीक के माध्यम से अब तक हजारों उन्नत नस्ल के मेमनों का जन्म हो चुका है, जिसने ग्रामीण परिवारों की आय में जबरदस्त इजाफा किया है।


बाराबंकी जिले में बकरी पालन के क्षेत्र में कृत्रिम गर्भाधान (AI) तकनीक के माध्यम से हजारों उन्नत नस्ल के मेमनों का जन्म हो चुका है, जिससे ग्रामीण आजीविका को नई दिशा मिली है। इस तकनीकी क्रांति की कमान अब पुरुषों के बजाय महिलाओं के हाथों में है। 
इस परिवर्तन की अगुवाई कर रही हैं गांधीनगर गांव की रहने वाली निशा प्रजापति, जो आज क्षेत्र की अग्रणी एआई वर्कर बन चुकी हैं। निशा कहती हैं “शुरुआत में यह काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन जब परिणाम दिखे और पशुपालकों का मुनाफा बढ़ा, तो समाज का नजरिया भी बदल गया।


करीब एक दशक पहले द गोट ट्रस्ट द्वारा जब इस तकनीक का क्षेत्र में पहला प्रदर्शन किया गया था, तब एआई वर्कर के रूप में अधिकांश पुरुष ही सक्रिय थे और महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित थी। लेकिन चार वर्ष पूर्व संस्था ने लड़कियों और महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण देना शुरू किया, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।

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आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। निशा प्रजापति जैसी स्थानीय महिलाएं हर वर्ष हजारों कृत्रिम गर्भाधान कर रही हैं और बकरी पालन को वैज्ञानिक आधार पर आगे बढ़ा रही हैं। इसके साथ ही, संस्था द्वारा बकरियों को एक साथ हीट (मद काल) में लाने की उन्नत तकनीक भी गांवों तक पहुंचाई गई है, जिससे उत्पादन और लाभ दोनों में वृद्धि हो रही है। स्थानीय बकरियों को उन्नत नस्ल के वीर्य (Semen) से गर्भधारण कराकर मेमनों की गुणवत्ता और वजन में सुधार हो रहा है ।

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इस पहल के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर रोशनी डालते हुए सामाजिक उद्यमी और पशुपालन क्षेत्र में क्रांति लाने वाले गोटमैन प्रो०संजीव कुमार ने कहा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का सबसे प्रभावी तरीका स्थानीय संसाधनों और समुदाय, खासकर महिलाओं को तकनीक से जोड़ना है। बाराबंकी में जो बदलाव दिख रहा है, वह आत्मनिर्भर गांवों की दिशा में एक मजबूत कदम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर सामाजिक ढांचे में भी सकारात्मक बदलाव ला रही है।

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