भारत ने ऑस्कर-नॉमिनेटेड फ़िल्म पर रोक लगाई | 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' विवाद की पूरी जानकारी
भारत में प्रतिबंधित हुई ऑस्कर-नॉमिनेटेड फिल्म 'The Voice of Hind Rajab'; सेंसर बोर्ड ने बताया 'अत्यधिक संवेदनशील'
भारत सरकार के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इजराइल-हमास संघर्ष की पृष्ठभूमि पर आधारित चर्चित डॉक्यूमेंट्री 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब'के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। ऑस्कर की दौड़ में शामिल रही इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के दृष्टिकोण से "अत्यधिक संवेदनशील" करार दिया है।
क्या है 'हिंद रजब' की कहानी?
यह डॉक्यूमेंट्री 2024 में गाजा पट्टी में हुई एक हृदयविदारक घटना पर आधारित है। फिल्म 5 साल की फिलिस्तीनी बच्ची, हिंद रजबकी सच्ची कहानी बयां करती है, जिसकी मौत इजराइली सैन्य अभियान के दौरान हुई थी।
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त्रासदी:हिंद रजब उस समय चर्चा में आई थी जब उसने अपनी कार से रेड क्रिसेंट (Red Crescent) को फोन कर मदद की गुहार लगाई थी, क्योंकि उसके परिवार के सभी सदस्य मारे जा चुके थे।
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वैश्विक प्रभाव:उसकी मौत और उसके बचाव के लिए गए पैरामेडिक्स की हत्या ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।
सेंसर बोर्ड (CBFC) का तर्क
रिपोर्ट्स के अनुसार, CBFC ने इस फिल्म को भारत में दिखाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। बोर्ड का मानना है कि:
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द्विपक्षीय संबंध:फिल्म की सामग्री भारत और इजराइल के बीच के रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
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संवेदनशीलता:इजराइल-हमास युद्ध पर आधारित दृश्य और नैरेटिव सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव के लिहाज से संवेदनशील हो सकते हैं।
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सिनेमैटोग्राफ एक्ट:बोर्ड ने उन प्रावधानों का हवाला दिया है जो राष्ट्र के हितों और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को खतरे में डालने वाली सामग्री को प्रतिबंधित करते हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम कूटनीति
फिल्म के निर्माताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि यह फिल्म किसी राजनीति के बजाय एक मानवीय त्रासदी और मासूमों के दर्द को दिखाती है। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) को देखते हुए सरकार ऐसे विषयों पर काफी सतर्कता बरत रही है।
'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि गाजा में चल रहे मानवीय संकट का एक दस्तावेज मानी जा रही है। भारत में इसके प्रदर्शन पर लगी रोक यह दर्शाती है कि कला और सिनेमा का कूटनीति के साथ संतुलन बनाना कितना जटिल कार्य है। अब देखना यह है कि क्या फिल्म के निर्माता इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
